Thursday, April 21, 2016

Ridiculous to blame BJP for Bhalaswa fire Fires at landfill sites natural phenomenon

New Delhi,Akash Dwivedi-Leader of Opposition in the Delhi Vidhan Sabha, Vijender Gupta today strongly condemned the Aam Aadami Party’s serious attempts to politicalize the unfortunate incident of fire which broke out in the morning at Bhalaswa Sanitary Landfill Site. He said that it is a strange that leader after leader including the Environment Minister, Imran Hussain, Chairman, DJB, Kapil Mishra, Ashutosh, Dilip Pandey have made concerted and mischievous attempts to put the entire blame on BJP for causing fire to spread pollution in the city and fail the odd-even scheme. Gupta said that nothing can be more ridiculous and far from truth then blaming BJP for what is a natural phenomenon in truth. Leader of Opposition said that fire at Sanitary Landfill Sites is caused due to reaction of methane and other gaseous substances. This is common not only in India but in foreign countries too. During summer, the sites become more prone to fires due to complex combustible chain reactions. The summer season and fairly good movement of air added fuel to fire today morning at Bhalaswa. The fire at the site is not a new for first-time phenomenon. This has been happening for many years now. It is highly condemnable to link the fire to odd-even scheme. A natural phenomenon cannot be linked to a social event of this nature and BJP cannot be blamed for this. Delhi Pollution Control Committee had already carried out the inspection in February and March. It has been felt that the Sanitary Landfill Sites have outlived their lives by many years and not much can be done in the given circumstances. Gupta said that the Bhalaswa Santitary Site was developed in 1994 according to the existing rules and regulations on the subject. The Municipal Solid Waste Rules, 2000 came into force much later. The site at Bhalaswa receives 2200 metric ton garbage everyday. Even the sites at Gazipur and Okhla were developed much before the MSW Rules came into being in 2000. All the three sites followed the existing rules and cannot match the provisions of the new rules. Everyone knows the difficulties being faced in obtaining land for sanitary landfill sites. Gupta said that in order to prevent fire, malba and soft land is spread over the garbage. The water is spread through sprinklers.

वेव ग्रुप की एक पहल ‘सेन्स’ ने भारत में की एंटी-एजिंग व वेलनेस कन्सेप्ट क्लीनिकों की शुरुआत

नई दिल्ली, 21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।भारत का अग्रणी व्यापार समूह वेव ग्रुप ने नई दिल्ली में एक बहुविशेषज्ञता वाले एंटी-एजिंग तथा वेलनेस क्लीनिक भारत में पहली बार, सेन्स एंटी-एजिंग एंड वेलनेस क्लीनिक सर्वोत्तम अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय परिपाटियों, चिकित्सकों और नवीनतम टैक्नोलॉजी को एक साथ ला रहा है और कार्यात्मक व पुनर्जनन चिकित्सा व जीवनशैली प्रबंधन के ज़रिए मस्तिष्क, शरीर व आत्मा के लिए पारम्परिक व आधुनिक तकनीक दोनो को मिलाकर लोगो का ईलाज किया जायेगा। इस अवसर पर डॉ ग्राहम सिंपसन, नील पेच,, जूली पॉवेल, डॉ मार्क ह्यूस्टन ने इसके बारे में जानकारी दी और बताया कि संस में मरीजो का किस प्रकार बेहतर ईलाज होगा। इसके साथ ही वेव ग्रुप कि निदेशक शनम चड्ढा ने बताया कि हमारी यह कोशिश रहती है कि हम हमारे ग्राहकों को सर्वोच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद और सेवाएं प्रदान करें स्वास्थ्य देखभाल एवं कुशलक्षेम क्षेत्र में इस नए उपक्रम के साथ, हम लोगों के जीवन में महसूस हो सकने वाला बदलाव लाने का लक्ष्य रखते है। हमारा विज़न ऐसे कुशलक्षेम केंद्रों की शृंखला तैयार करना है जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, शोध-संचालित और आंतरिक व बाहरी शरीर को प्रतिबिंबित करने वाले कुशलक्षेम उपचारों के चिकित्सीय रूप से अनुकूलित स्वरूपों का उपयोग करते हुए मस्तिष्क-शरीर-आत्मा के ज़रिए ‘बढ़ती आयु के प्रभावों से जूझ रहीं मानव कोशिकाओं को निरोगी बनाना तथा ऐसे करके हमारे जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। AKASH DWIVEDI

बाबा बंदा सिंह बहादर का राज गुरुनानक देव जी के सरबत के भले के सिद्धांत पर पहरा देने वाला राज था- जी.के.

पंथक शिक्षा देने के लिए कमेटी द्वारा उठाये जा रहे कदम ऐतिहासिक: कालका नई दिल्ली,21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।बाबा बंदा सिंह बहादर की तीसरी शहीदी शताब्दी को समर्पित विशेष गुरमति समागम गुरुद्वारा श्री गुरु गोबिन्द सिंह सभा, तुगलकाबाद ऐक्सटैंशन में करवाया गया। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा करवाये गये इस समागम में गुरबाणी विरसा संभाल स्त्री सत्संग सभा, प्रसिद्ध रागी भाई सरबजीत सिंह दुर्ग वाले एवं श्री दरबार साहिब के हजूरी रागी भाई इन्द्रजीत सिंह बम्बई वालों ने गुरबाणी कीर्तन द्वारा संगतों को निहाल किया। कमेटी अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के. एवं पूर्व विधायक तथा स्कूली शिक्षा कमेटी के चेयरमैन हरमीत सिंह कालका ने संगतों को संबोधित करते हुए बाबा जी की लासानी शहीदी शहादत को मनाने के लिए कमेटी द्वारा की जा रही पहलकदमीयों की जानकारी दी। जी.के. ने कहा कि बाबा बंदा सिंह बहादर सिख कौम के महान जरनैल एवं महान शहीद हैं पर इतिहासकारों ने सिखी को उनकी देन को संगतों तक पहुंचाने के लिए वह तत्परता नहीं दिखाई जो दूसरे धर्मां के बादशाह या शहीदों की देन को पहुंचाने में दूसरे इतिहासकारों ने दिखाई है। मौजूदा समय में किसानों की दयनीय हालातों का जिक्र करते हुए अलग-अलग सरकारों द्वारा किसानों को सहारा देने के लिए की जा रही कोशिशों की बाबा जी के राज से तुलना करते हुए जी.के. ने उक्त कोशिशों को नाकाफी बताया। बाबा जी द्वारा खेतीहर मजदूरों को जमीनों का मालिक बनाने जैसे उठाये गये इन्कलाबी कदमों से सरकारों को नसीहत लेने की भी जी.के. ने सलाह दी। जी.के. ने कहा कि बाबा जी का राज गुरुनानक देव जी के सरबत के भले के सिद्धांत पर पहरा देने वाला राज था। कालका ने कमेटी द्वारा धर्मप्रचार को सामने रख कर शिक्षण कैलण्डर में किये गये बदलावों का श्रेय कमेटी प्रधान मनजीत सिंह जी.के. की अग्रणी सोच को देतेे हुए उक्त सुधारों को ऐतिहासिक करार दिया। कालका ने कहा कि कमेटी ने स्कूलों के गोल्डन जुबली वर्ष में गुरू साहिबानों के प्रकाशपर्व एवं चुनींदा शहीदी दिवसों पर स्कूल में आवश्यक छुट्टी करके स्कूलों की स्थापना के पीछे के पंथक शिक्षा देने के हमारे बुर्जुगों के लक्ष्य को प्राप्त करने का जो यत्न किया है वह स्कूलों एवं विद्यार्थियों के भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होगा। कमेटी के इन यत्नों से बच्चों को धर्म एवं गुरू साहिबानों के बारे में अधिक जानकारी मिलने का भी कालका ने दावा किया। इस अवसर पर जी.के. ने मल्टीमीडिया साधनों द्वारा गुरबाणी की जा रही डाउनलोडिंग सुविधा का भी जायजा लिया।

19 मोबाइल फोन और 1.30 करोड़ रुपये के कैश ट्रांसफर वाउचर के साथ दो गिरफ्तार

नई दिल्ली,21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी। राजधानी स्थित बसंत विहार थाना क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों को ऑनलाईन माध्यम से ठगी करने वाले गिरोह को गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हाथ लगी है।पुलिस ने इस गिरोह के सदस्यों के पास से 19 मोबाइल फोन और 1.30 करोड़ रुपये के कैश ट्रांसफर वाउचर बरामद किया है।गिरफ्तार आरोपी की पहचान जहांगीरपुरी निवासी सुभाष (40), बिहार निवासी राम शरण राय (38) के रूप में हुई है।पुलिस सूत्रो के अनुसार, 13 मार्च को मोतीलाल नेहरू कैंप निवासी महावीर सिंह ने वसंत विहार थाने में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसके मोबाइल पर एक फोन आया था। फोन करने वाले ने बताया कि वह बैंक अधिकारी है और अकाउंट लॉक होने से बचाने के लिए एटीएम डिटेल चाहिए। महावीर ने उसे अपने एटीएम का सारा डिटेल दे दिया था। इसके बाद उसके अकाउंट से एक लाख 69 हजार रुपये निकाल लिए गए थे। ठग की गिरफ्तारी के लिए एक टीम बनाई गई। टीम ने पीड़ित जिस नंबर से फोन आया था, उसका डिटेल निकाला। जांच में पता चला कि फोन नंबर का मालिक कई ई-कॉमर्स कंपनियों के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम पैसों के ट्रांसफर करता है। पुलिस ने जब उन ऑनलाइन ट्रांसफर को ट्रैक किया तो पता चला कि जहांगीरपुरी का रहने वाला सुभाष द्वारा इस नंबर का उपयोग किया जाता है। उसका जहांगीरपुरी में मोबाइल रीचार्ज की दुकान है। यह भी पता चला कि वह लगातार रामशरण राय नाम के व्यक्ति से बात करता था। टीम ने जहांगीरपुरी से सुभाष को फिर राम शरण को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ में बताया कि इनके द्वारा किए जाने वाले ऑनलाइन ठगी में झारखंड के जामतारा निवासी रंजीत, नेपाल मंडल और सुभाष मंडल सहयोग करते हैं। पुलिस इन तीनों को तलाश रही है। AKASH DWIVEDI

महाराष्ट्र से वृद्ध को ऑटो चालक ने पेय पदार्थ पिला के लूटा

नई दिल्ली,21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।दिल्ली में बाहरी प्रदेशो से आये लोगो के साथ लूट की वारदात थमने का नाम नहीं ले रही है।ऐसी ही एक घटना महाराष्ट्र से दिल्ली आये एक वृद्ध के साथ घटी । जानकारी के मुताबिक हजरत निजामुद्दीन इलाके में ऑटो चालक ने बुजुर्ग को नशीला शर्बत पिलाकर लूटपाट के बाद बेहोशी की हालत में सड़क किनारे छोड़कर फरार हो गया। होश आने पर बुजुर्ग ने हजरत निजामुद्दीन थाने में शिकायत दर्ज कराई।पुलिस सूत्रो के अनुसार, 60 साल के पीड़ित शंकर प्रसाद मूलरूप से महाराष्ट्र के अहमदनगर के रहने वाले हैं। वह बिजली विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। वह व्यक्तिगत काम से सोमवार को द्वारका स्थित मेट्रो ट्रेडिंग कंपनी में आए थे। काम के बाद अहमदनगर वापस जाने के लिए निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचे। कोई ट्रेन नहीं होने के कारण वह स्टेशन से बाहर आ गए। बाहर एक ऑटो वाला उनके पास आया। उसने बुजुर्ग से पूछा कि आप कहा जाएंगे। बुजुर्ग ने बताया ट्रेन नहीं होने के कारण उन्हें आज यहीं ठहरना है। ऑटो वाले ने कहा कि वह उन्हें अच्छे लॉज में ले जाएगा। उसके कहने पर बुजुर्ग ऑटो में बैठ गए। उसमें पहले से एक व्यक्ति बैठा था। कुछ दूर जाने के बाद दोनों पानी पीने के बहाने रुके। दोनों ने बुजुर्ग को भी बाहर बुलाकर पानी और शर्बत पिलाया। थोड़ी ही देर बाद बुजुर्ग बेहोश हो गए। जब उन्हें होश आया तो पता चला कि तीन हजार रुपये, मोबाइल, वोटर आइकार्ड, आधार कार्ड समेत कई कागजात व कपड़ों से भरा बैग गायब है। AKASH DWIVEDI

जत्थेदार, मक्कड़ को तलब करें या पद से इस्तीफा दें- सरना

नई दिल्ली 21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी। शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के महासचिव हरविंद्र सिंह सरना ने शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ व श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह में चलती ठंडी जंग पर गहरी चिंता का प्रगटावा करते कहा कि आपसी तनाव को लेकर दोनों ही पंथ की कचहरी के आरोपी हैं फिर भी शिरोमणि कमेटी के प्रधान मक्कड़ ने जत्थेदार के अधिकारों पर टिप्पणी करके मर्यादा की उल्लंघना ही नहीं कि बल्कि अकाल तख्त की सर्वउच्चता को चुनौती दी है जिसको लेकर जत्थेदार को चाहिए है कि मक्कड़ को बिना किसी देरी से अकाल तख्त साहिब पर तलब करके उसके विरूद्ध मर्यादा अनुसार कार्रवाई करें। जारी एक ब्यान में सरना ने कहा कि शिरोमणि कमेटी प्रधान मक्कड़ व जत्थेदार अकाल तख्त ज्ञानी गुरबचन सिंह बादलों की नजरों में अच्छे बनने की कोशिश करते आपस में उलझ कर तख्त साहिब की मर्यादा व परम्पराओं का शोषण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मक्कड़ द्वारा दिया गया ब्यान कि जत्थेदार को शिरोमणि कमेटी के सचिवों और मैनेजरों की मीटिंग बुलाने का कोई अधिकार नहीं है, स्पष्ट करता है कि मक्कड़ को जत्थेदार पर विश्वास नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि जत्थेदार तख्त साहिब की मान-मर्यादा को बहाल रखने में नाकाम रहा है तो शिरोमणि कमेटी की कार्यकारिणी कमेटी अपने अधिकारों का प्रयोग करके बिना किसी देरी से जत्थेदार को पद से हटाएं। उन्होंने कहा कि मक्कड़ द्वारा दिया गया ब्यान मर्यादा अनुसार श्री अकाल तख्त साहिब की सर्वउच्चता को सीधी चुनौती है क्योंकि जत्थेदार सर्वउच्च है व उसको आदेश करने के अधिकार मर्यादा अनुसार मिले हैं और वह मीटिंग के लिए शिरोमणि कमेटी के सचिवों व मैनेजरों की ही मीटिंग बुलाने का अधिकार नहीं रखता बल्कि पंथ संस्थाओं के प्रबंधकों की मीटिंग भी बुला सकता है। उन्होंने कहा कि मक्कड़ यह भी स्पष्ट करें कि जितने व्यक्ति भी अब तक श्री अकाल तख्त साहिब पर तलब किये गये हैं क्या वह शिरोमणि कमेटी से इजाजत लेकर किये गये हैं? उन्होंने कहा कि मक्कड़ का गुनाह बर्दाशत से बाहर है व उससे इस्तीफा लिया जाना चाहिए। AKASH DWIVEDI

ऑटो एक्सपो में प्रदर्शित यामाहा का नेक्स्ट जनरेशन रियल ब्वॉयज़ स्कूटर सिगनस रे-ज़ैडआर भारतीय बाज़ार में उतारा गया

ई दिल्ली, 21 अप्रैल, आकाश द्विवेदी। नए सैल्यूटो आरएक्स के लॉन्च के मात्र एक सप्ताह बाद इण्डिया यामाहा मोटर ने आज भारतीय बाज़ार के लिए नए सिगनस रे-ज़ैडआर स्कूटर के लॉन्च की घोषणा की है जो भारतीय बाज़ार में मई 2016 से उपलब्ध होगा। गौरतलब है कि इस नए सिगनस रे-ज़ैडआर का अनावरण इसी साल फरवरी में 13 वें ऑटो एक्सपो के दौरान किया गया था। सिगनस रे -ज़ैड आर, यामाहा के दोपहिया वाहनों की रेंज में अत्याधुनिक उत्पाद है। ‘नेक्स्ट जनरेशन रियल ब्वाॅयज़ स्कूटर’ की अवधारणा पर पेश किया गया सिगनस रे - ज़ैडआर बेहद स्टाइलिश और शानदार है। अपने अत्याधुनिक लुक के साथ यह स्कूटर अपने आप में गतिशीलता का प्रतीक है। नया सिगनस रे -ज़ैड आर स्कूटर कन्टीन्यूअसली वेरिएबल ट्रांसमिशन (सीवीटी) से युक्त एयर-कूल्ड 4-स्ट्रोक, एसओएचसी, 2-वॉल्व 113 सीसी ‘‘ब्लू कोर’’ इंजिन द्वारा पावर्ड है। अपनी लाईटवेट बाॅडी (103 किलोग्राम) और ग्लैमरस डिज़ाइन के साथ यह उपयोगकर्ताओं के लिए बेहद अनुकूल है। इस मौके पर यामाहा मोटर इण्डिया के वीपी-सेल्स एण्ड मार्केटिंग रॉय कुरियन ने कहा, भारत में दोपहिया वाहनों की कुल मांग में से स्कूटर सेगमेन्ट बिक्री में 30 फीसदी का योगदान देते हैं और हमें उम्मीद है कि इस साल बाज़ार में इस सेगमेन्ट की हिस्सेदारी 10 फीसदी तक बढ़ेगी। युवाओं को ध्यान में रखते हुए पेश किया गया यामाहा का स्टाइलिश, स्पोर्टी और इनोवेटिव नया सिगनस रे-जै़ड आर निश्चित रूप से स्टाइल एवं प्रोद्यौगिकी युवाओं को पसंद आएगा। AKASH DWIVEDI

भलस्वा सेनेटरी लेण्डफिल साईट में आग राजनीतिक साजिश नहीं ,एक प्राकृतिक प्रक्रिया -विजेन्द्र गुप्ता

नई दिल्ली,21 अप्रैल,काश द्विवेदी।विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता विजेन्द्र गुप्ता ने आज भलस्वा सेनेटरी लेण्डफिल साईट में आज सुबह लगी दुर्भाग्यपूर्ण आग को लेकर आम आदमी पार्टी की तरफ से पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन, चेयरमेन जलबोर्ड कपिल मिश्रा, आशुतोष, दिलीप पांडे, जैसे अनेक बड़े नेताओं द्वारा ट्वीट पर ट्वीट करके इसे राजनीतिक साजिश करार दिये जाने की कड़ी भत्र्सना करी है । उनका यह कहना राजनीतिक दुर्भावना से परिपूर्ण है कि यह सब भाजपा ऑड-इवन को फैल करने के लिए अपना रही है । विपक्ष के नेता ने कहा कि सेनेटरी लैण्डफिल साईट पर आग लगना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है । इसे किसी राजनीतिक भावना अथवा इरादे से जानबूझकर नहीं लगाया गया है । यह समस्या प्रारम्भ लम्बे समय से विद्यमान रही है । भारत ही नहीं अपितु विदेशों के लैण्डफिल स्थलों में गर्मी के मौसम में आग लगना एक स्वाभाविक क्रिया है । कूड़े के ढेर में मीथेन गैस व अन्य गैसीय तत्व आपस में मिलकर आग पैदा करते हैं । गर्मी के दिनों में आग लगने की ज्यादा सम्भावना रहती है । चॅंूकि आज प्रातः गति से हवा भी चल रही थी, आग ने जोर पकड़ लिया । इस प्रकार की आग पिछले अनेक वर्षों में कई बार लग चुकी है । गुप्ता ने कहा कि चूंकि आज की आग आड-इवन स्कीम के असफल क्रियान्वयन के दौरान लगी है इसलिए आम आदमी पार्टी इसे छिपाने के लिये भाजपा को दोष दे रही है । एक प्राकृतिक प्रक्रिया को राजनीति से जोड़ना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है । दिल्ली प्रदूषण नियत्रंण कमेटी इस वर्ष फरवरी तथा मार्च में स्थलों का निरीक्षण कर चुकी है । उसने पाया कि लेण्डफिल साईटें अपने निर्धारित जीवन से कई वर्ष अधिक काम कर चुकी हैं और विद्यमान परिस्थितियों में बहुत कुछ कर पाना सम्भव नहीं है । गुप्ता ने जानकारी दी कि भलस्वा सेनेटरी लैण्डफिल स्थल को 1994 में स्थापित किया गया था, जबकि म्यूनिसिपल सालिड-वेस्ट के नियम वर्ष 2000 में लागू हुये । यहां पर उत्तरी तथा दक्षिणी दिल्ली का लगभग 2200 मीट्रिक कूड़ा डम्प किया जाता है । यहीं नहीं गाजीपुर तथा ओखला में भी स्थित सेनेटरी लेण्डफिल साईट उक्त नियमों के वर्ष 2000 में लागू होने से पूर्व के बने हुये हैं । दिल्ली के तीनों विद्यमान लेण्डफिल साईट उक्त नियमों के लागू होने से पहले निर्मित होने के कारण उस समय के निर्धारित नियमों के अनुसार निर्मित किये गये थे । गुप्ता ने जानकारी दी कि भलस्वा, ओखला तथा गाजीपुर सेनेटरी लेण्डफिल साईटों में आग की रोकथाम के लिये समय समय पर उपरी सतह पर मिट्टी व मलबा डाला जाता है । इसके अतिरिक्त पानी का छिड़काव भी किया जाता है । AKASH DWIVEDI

संता -बंता फिल्म के खिलाफ दिल्ली कमेटी चार स्थानों पर प्रदर्शन करेगी

नई दिल्ली,21 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी एवं शिरोमणी अकाली दल दिल्ली इकाई द्वारा 22 अप्रैल को दिल्ली में 4 स्थानों पर रोष प्रदर्शन करने का ऐलान किया गया है। हिन्दी फिल्म संता-बंता प्राईवेट लिमिटेड के प्रसारण को दिल्ली के सिनेमाघरों में हर हालत में रोकने के लिए अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के. की नेतृत्व में अकाली दल के आफिस में आज हुई मीटिंग में सभी कानूनी तथ्यों पर विचार करने के उपरान्त दल द्वारा सड़कों पर उतरने का फैसला लिया गया। यह प्रदर्शन पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण जोन में सिनेमाघरों के बाहर किये जायेंगे जिसके स्थानों के बारे में देर रात तक आम राय बनाई जायेगी। जी.के. ने मीटिंग में मौजूद कमेटी सदस्यों एवं अकाली दल के पदाधिकारियों को इस मसले पर कमेटी द्वारा लड़ी गई कानूनी लड़ाई का विवरण भी दिया। जी.के. ने साफ किया कि सिखों की बौद्धिक ताकत का मजाक उड़ाने वाली किसी भी भाषा में बनी फिल्म को कौम अब मन्जूर नहीं करेगी क्योंकि सिखों पर बनते चुटकुलों के मसले पर दिल्ली कमेटी द्वारा याचिकाकर्ता ऐडवोकेट हरविन्दर कौर चौधरी के साथ मिलकर कौम में पैदा हुई जागरूकता से सिखों को निशाना बनाने वाले मजाक को सिखों ने बुरा समझना शुरू कर दिया है। कमेटी द्वारा इस मसले पर 3 बार दिल्ली हाईकोर्ट में जाने का हवाला देते हुए जी.के. ने कहा कि फिल्म के खिलाफ कानूनी लड़ाई को हम बड़ी संजीदगी से लड़ रहे हैं पर सैंसरबोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी की बोली एवं सोच सिखों के ऐतराजों को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती है। दिल्ली कमेटी द्वारा सैंसरबोर्ड से मिली मान्यता को दो बार कानूनी तरीके से रद्द करवाने की जानकारी देते हुए जी.के. ने पार्टी कार्यकर्ताओ को फिल्म के प्रसारण को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने की छूट दे दी। कल सैंसरबोर्ड के चेयरमैन के साथ मुंबई में कमेटी के शिष्टमंडल की दिल्ली हाईकोर्ट की हिदायत पर हुई मुलाकात का विवरण भी जी.के. ने दिया।

Wednesday, April 20, 2016

जसवीर कौर शादी के बाद सब टीवी के शो अड़ोस पड़ोस के साथ छोटे पर्दे पर वापस लौटी

नई दिल्ली,16 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।ग्लैमरस जसवीर कौर इस वर्ष व्यवसायी विशाल मडलानी के साथ मार्च माह में व्याह रचाने के बाद काम पर वापस आ गयी है। इस अभिनेत्री को सब टीवी के शो अड़ोस पड़ोस में एक ग्लैम अवतार में देखा जाएगा, जो इस वर्ष अप्रैल के अंत में प्रसारण के लिए तैयार है। अड़ोस पड़ोस की कहानी दो परिवारों सिंह एवं कोहली परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनमें छत्तीस का आंकड़ा है और उनका व्यवसाय उनके झगडे़ की प्रमुख जड़ है। कोहली परिवार केक शाॅप चलाता है और सिंह परिवार एक मिठाई की दुकान चलाता है। ये दोनो परिवार एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए पुरजोर कोशिश करते रहते हैं। जसवीर एक खूबसूरत महिला की भूमिका निभा रही है, जो अपने पति से अपनी बात मनवाने के लिए अपनी खूबसूरती का इस्तेमाल करती है। वह एक ऐसी शक्स है, जो अपना काफी समय कैमरे के सामने बिताती है एवं उसे सेल्फी लेने का क्रेज है। इसके चरित्र को एक फिटनेस फ्रीक के तौर पर प्रदर्शित किया जाएगा, जिसे जिम करते, जूस पीते, सलाद खाते अथवा हेल्थ, फिटनेस व फैशन मैगजीन पढ़ते हुए देखा जाएगा।

लोगो को भा रहा पालिका परिषद् का मोबाइल एप्प एनडीएमसी 311 मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रिया

नई दिल्ली,18 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् क्षेत्र के निवासियों की सुविधा के लिए एक मात्र समाधान के रूप में उपलब्ध कराई गई मोबाइल एप एनडीएमसी 311 को अपने बेहतर प्रदर्शन के कारण सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है । इस हाईटेक मोबाइल एप्प से एक महीने के अंदर ही 5300 नागरिक जुड चुके हैं । यह जानकारी नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् की सचिव चंचल यादव ने दी । उन्होंने बताया कि अब तक पिछले एक महीने मे 1966 शिकायतें प्राप्त हुई जिनमें से 1664 का संतोषजनक निवारण कर दिया गया है । इनमे से 549 नागरिकों की शिकायतों का निवारण उनकी संतुष्टि के अनुसार हो चुका है जबकि इनमें से 189 शिकायतों पर संबंधित विभाग द्वारा त्वरित कार्यवाही की जा रही है इनहें भी जल्दी हल कर लिया जाएगा। यादव ने आगे बताया कि इनमे से 87 शिकायतो को जल्दी ही हल किया जाना वाला है और 26 शिकायते ऐसी रही जिनमें शिकायतकर्ता की संतुष्टि नही होने के कारण उन्हें दुबारा खोला गया और उन पर संबंधित विभाग कार्यवाही कर रहा है । उन्होने बताया कि सिविल इंजीनियरंग, जन स्वास्थ्य और उद्यान विभाग के पॉंच कर्मचारियों का शिकायत निवारण की दिशा में किया गया कार्य उत्कृष्ट श्रेणी का था जबकि विद्युत और सिविल इंजीनियरंग विभाग के पॉंच कर्मचारियों का कार्य शिकायत निवारण पर कार्यवाही के निर्धारित मानको के अनुरूप नही पाया गया । यादव ने कहा कि उत्कृष्ट कार्य करने वाले कर्मचारियों को पालिक परिषद् की और से प्रोत्साहित किया जाएगा जबकि निर्धारित मानको के अनुरूप कार्य नहीं करने वाले कर्मचारियों को अपना कार्य प्रदर्शन सुधारने के लिए कार्य के प्रति सम्पर्ण, परिश्रम और दायित्व निर्वाह के प्रति संजीदा होने के लिए प्रेरित किया जाएगा । इस मोबाइल एप्लीकेशन को इस प्रकार डिजाइन और विकसित किया गया है कि इससे पालिका परिषद् क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्या का समाधान करने के साथ-साथ इसके माध्यम से नई दिल्ली क्षेत्र में आने-जाने और घूमने-फिरने वाले लोगों को आधारभूत सुविधाओं की सामान्य से लेकर विशेष जानकारी तक से अवगत कराया जा सके । इस एप्प के माध्यम से कोई भी नागरिक पालिका परिषद् क्षेत्र में मेट्रो स्टेशन, शौचालय, टेक्सी स्टेंड, ऐतिहासिक स्मारकों और ट्रैफिक की जानकारी और पार्किंग की उपलब्धता की जानकारी अपने फोन पर कुछ क्लिक से ही प्राप्त कर सकेगा akash dwivedi

मुख्यमंत्री ऑड-इवन स्कीम की आड़ में जनता के करोड़ों रूपयों का हिसाब दें - गोयल

नई दिल्ली, 20 अप्रैल,आकाश द्विवेदी। सांसद विजय गोयल ने कहा कि केजरीवाल सरकार आॅड-इवन स्कीम को लेकर पहला कन्फ्यूज है, दूसरा जनता को गुमराह कर रही है और तीसरा जनता के टैक्स के करोड़ों रूपयों को अपना चेहरा चमकाने के लिए फूंक रही है। गोयल ने ऐलान किया कि आम आदमी पार्टी के 67 विधायकों को षुक्रवार 22 अप्रैल को उनके निवास स्थान पर जाकर फूल भेंट करेंगे और एक मांग पत्र भी देंगे कि किस तरह से आॅड-इवन स्कीम को बिना तैयारी के लागू कर दिया गया, जिससे जनता को बेहद परेषानी हो रही है और प्रदूशण कम होने की जगह बढ़ गया है। मांग-पत्र में यह भी होगा कि केजरीवाल जनता के करोड़ों रूपए जो उन्होंने इस स्कीम में फूंक दिए हैं, उसका हिसाब दें। मांग-पत्र में इसके साथ-साथ जनता की परेषानियों का भी जिक्र होगा। आॅड-इवन के नाम पर जो भ्रश्टाचार हो रहा है, उसको रोकने के लिए मदद की गुहार लगाई जाएगी। गोयल ने बताया कि इस योजना के अन्तर्गत हम वालियंटरों की भर्ती कर रहे हैं। ये वालियंटर मोटरसाइकिल, स्कूटर पर एक खास रंग की टीषर्ट पहनकर फूल के साथ बड़े प्यार से आम आदमी पार्टी के विधायकों को मांग-पत्र भी देंगे और उनसे इस पर सहयोग मांगेंगे। गोयल ने कहा कि ये लोग जनता के चुने हुए नुमाइंदे हैं, पर उनकी सरकार का मुखिया मनमाने ढंग से पक्षपातपूर्ण तरीके से चीजों को लागू कर रहा है, उसको रोका जाए। गोयल ने कहा कि पानी, बिजली, अनधिकृत कालोनी, झुग्गी-झोंपड़ी की तरफ से ध्यान हटाने के लिए दिल्ली की जनता को आॅड-इवन में उलझा दिया गया है और जनता आॅड-इवन को लूडो की तरह खेल रही है। परिवहन मंत्री गोपाल राय अपनी पीठ थपथपाते हुए कहते हैं कि आॅड-इवन सफल हो गया है, पर जनता उनके दावों को झुठला रही है। अगर इसको वो सफल मानते हैं, तो क्यों नहीं घोशणा करते कि स्थायी तौर पर इसको लागू किया जाएगा। मुख्यमंत्री यह कहकर कि आने वाले समय में दुपहिए वाहनों को भी इसमें षामिल किया जाएगा, दुपहिए वाहन वालों को डरा रहे हैं। गोयल ने कहा कि हम किसी अच्छी स्कीम के खिलाफ नहीं है, पर स्कीम में सुधार करने और सरकार को राह पर लाने का काम हमें करना है। akash dwivedi

एनआईए का खुलासा सोनिया-कांग्रेस के आपराधिक षडयंत्र का भंडाफोड़ :सुरेन्द्र जैन

नई दिल्ली,20अप्रैल,आकाश द्विवेदी। विश्व हिन्दू परिषद ने आज कहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा इस खुलासे ने कि समझौता ब्लास्ट मामले में पुरोहित व अन्यो के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं हैं, कांग्रेस के देशद्रोही चेहरे को एक बार फिर से उजागर कर दिया है| विहिप के अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त महा मंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन ने यह भी कहा कि इससे पूर्व भी इशरत के मामले में सोनिया सरकार के गृह मंत्री के झूठे शपथ पत्रों से यह सिद्ध हो चुका है कि वे आतंकियों को बचाने के लिए हिन्दू नेताओ और संतो पर झूठे मामले दर्ज करते थे| पहले सिमी जैसे देशद्रोही संगठनो को समर्थन और उसके बाद बिना सबूतों के हिन्दू आतंकवाद शब्द को गढ़ना, यह बताता है कि सोनिया गाँधी सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाकर देश को नुकसान पंहुचा सकती है| सोनिया ने न केवल आतंकियों के हौंसले बढ़ाये हैं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मजाक बनवाया है| इन्होने झूठे मामलों में हिन्दुओ को फंसाकर अल कायदा के सहायक बनकर असली आतंकियों को छोड़ने का अपराध भी किया है| खिसियानी बिल्ली की तरह अब कांग्रेस को कुतर्कों का सहारा नहीं लेना चाहिए । akash dwivedi

Tuesday, April 12, 2016

ASSOCHAM Reaction: IIP for February 2016

akash dwivedi----Terming the February 2016 IIP numbers ‘encouraging,’ apex industry body ASSOCHAM said that it is pleased to see the positive industrial growth figures as industrial production had been in the negative territory for the last three months. “The good performance of electricity, mining, basic and consumer durable goods in particular seems to have resulted in the favourable development,” said Mr Sunil Kanoria, president of The Associated Chambers of Commerce and Industry of India (ASSOCHAM). “However shrinkage in production of capital goods and consumer non-durables are going to be the key challenges in days to come,” said Mr Kanoria. “The declining growth of manufacturing sector indicated by 0.7 per cent growth in February 2016 as compared to 5.1 per cent in the same period in 2015 also needs policy intervention,” he added. “The continuing subdued growth of manufacturing sector has got wider implications and needs to be addressed on priority basis,” further said the ASSOCHAM chief. ASSOCHAM is hopeful that amidst the recent budget announcement of Government’s commitment towards fiscal consolidation combined with the Reserve Bank of India (RBI) reducing repo rate by 25 basis point in its First Bi-monthly Monetary Policy Statement for FY 2016-17 would further help the industry in gaining a strong foothold and sustained growth. “Competitive interest rates are necessary for reviving investor sentiments which in turn would help put the economy back firmly on growth trajectory, however it is now the responsibility of banks to pass on benefits of rate cuts to the end consumer,” added the ASSOCHAM chief.

सभी गुरूओं के प्रकाश पर्वो और तीन शहीदी पर्वो पर स्कूलों में रहेगा अवकाश

नई दिल्ली,12 अप्रैल,आकाश द्विवेदी। वैशाखी के उपलक्ष्य में 13 अप्रैल की पहले से तय छुट्टी को समाप्त करने का दिल्ली के स्कूलों को दिल्ली सरकार द्वारा दिये गये आदेश की दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने निन्दा की है। कमेटी अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के. ने आज गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के सभागार में पत्रकारों को कमेटी के स्कूलों में नये शैक्षिणक सत्र मंे लागू किये गये ऐतिहासिक शिक्षण सुधारों की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रैसवार्ता में खालसा स्थापना दिवस के संबंध में वर्षो से पांबदीशुदा छुट्टी के नाम से दी जा रही छुट्टी को दिल्ली सरकार द्वारा समाप्त करने का खुलासा किया। जी.के. के साथ स्कूली शिक्षा परिषद के चेयरमैन व पूर्व विधायक हरमीत सिंह कालका ने भी पत्रकारों को कमेटी द्वारा गुरू हरिकृष्ण पब्लिक स्कूलों के शिक्षण कैलण्डर में किये गये बदलावों की जानकारी दी। जी.के. ने बताया कि पहले हमारे स्कूलों में गुरू नानकदेव जी, गुरु गोबिन्द सिंह जी तथा गुरू हरिकृष्ण साहिब जी के प्रकाश पर्व पर ही छुट्टी होती थी परन्तु अब दस गुरू साहिबानों के प्रकाश पर्व के साथ ही गुरु गं्रथ साहिब जी के प्रकाश पर्व पर भी छुट्टी रहेगी। जी.के. ने कहा कि पहले श्री गुरू अर्जुन देव जी तथा गुरू तेग बहादर साहिब जी के शहीदी दिवस पर स्कूलों में छुट्टी का जो प्रावधान था उसमें अब छोटे साहिबजादों के शहीदी दिवस को भी शामिल कर दिया गया है। इन छुट्टियों को बढ़ाने से जी.के. ने किसी भी प्रकार से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित ना होने का दावा करते हुए स्कूलों में बच्चों को धर्म तथा संस्कृति से बेहतर तरीके से जुड़ने की भी बात कही। जी.के. ने कहा कि एक तरफ हम सिख धर्म के स्कूलों में प्रचार-प्रसार के लिए शिक्षण कैलण्डर में बदलाव कर रहें हैं वहीं दूसरी ओर सिखों की हमदर्द होने का दंभ भरने वाली आम आदमी पार्टी सरकार सिख भावनाओं को कुचलने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती। जी.के. ने कमेटी के सभी स्कूलों का बैंक खाता इस सत्र से केंद्रीयकृत करने की जानकारी देते हुए इसके फायदे को भी गिनाया। जी.के. ने बताया कि 12 स्कूलांे का एक खाता होने से जहां फीस के रूप में स्कूलों को प्राप्त होने वाली आमदन एक स्थान पर होगी वहीं अध्यापकों और बाकी स्टाफ को हर महीने की पहली तारीख को वेतन जारी करने में भी कठिनाई नहीं होगी। कुछ स्कूलांे के घाटे में होने के कारण स्टाफ को वेतन मिलने में कभी कभार होती देरी का भी एक बैंक खाता होने से हल निकलने का जी.के. ने दावा किया। कालका ने 28-29 अप्रैल को कमेटी द्वारा शिक्षा का लंगर लगाते हुए विद्यार्थियों को कैरियर चुनने का विकल्प उपलब्ध करवाने के लिए गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के भाई लक्खी शाह वणजारा हाॅल में कैरियर गाईडनेस कैंप लगाने की जानकारी देते हुए इस कैंप में लगभग 500 से 700 विश्वविद्यालयों, काॅलेजों तथा संस्थानों के द्वारा स्टाल लगाने की भी बात कही। कालका ने पुराने प्रबंधकों की गलती के कारण अतिरिक्त स्टाफ स्कूलों में रहने से कमेटी के स्कूलों में पैदा हुआ घाटा लगभग अब मौजूदा कमेटी की तत्परता के कारण खत्म होने का दावा करते हुए जल्द ही इस संबंध में जरूरी आंकड़े कमेटी द्वारा जारी करने की बात कही। कालका ने बताया कि स्कूलों में इस वर्ष ई-गवर्नस लागू होने से अभिभावकों को अपने बच्चों की प्रगति की जानकारी रोजाना मिलेगी।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

नई दिल्लीस, ( कविलाश मिश्र)। आगे की कथा बताते हुए मुरारी बापू बताते है कि बालकांड में रामजी व उनके भाइयों की बालपन की चर्चा हैं और अयोध्याह कांड में उनके और उनके भाइयों के युवानी ( युवावस्था ) की चर्चा हैं। इसलिए तुलसी जी शिवजी का स्म रण करते हुए उनकी प्रार्थना कर रहे है। वे कहते हैं कि भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता , भक्तों के पापनाशक, सर्वव्यापकचन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्री शंकरजी सदा मेरी रक्षा करें। मुरारी बापू कहते हैं कि युवाओं को शिवजी या वे जिस किसी की पूजा कर रहे हो, उनकी आराधना करनी चाहिए। भजन का कोई समय नहीं होता, कोई आयु निश्चित नहीं है। भजन आयु का विषय नहीं हैं। यह युवानी विषय है। यदि बुद्ध पुरूष का साथ होगा तो उनके कार्य सफल होंगे। ’ श्री गुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥ श्री गुरुजी के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो चारों फलों को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला है। आयोघ्याव के समृद्धि का बखान नहीं हो सकता है। लेकिन जहां अतिशय सुख होता है वहीं अतिशय दुख होता है। जिस किसी के साथ अति शब्दा का जुडाव हो जाता है वह परेशान करने वाला सबब बन सकता है। अतिशय से मिलना चाहिए। राज तिलक की घोषणा हो गई है। लेकिन, दूसरी तरु विधाता ने भी अपना काम शुरू कर दिया है। देवताओं ने सरस्ववति जी की स्तुनति की है। इसके पश्चाेताप्‍ सरस्विति जी ने मंथरा की बुद्धि घुमा दी है और मंथरा ने कैेकयी की बुद्धि का एक प्रकार से हरन कर लिया है। जिस कैकयी को सभी पुत्रों में सबसे प्रिय पुत्र राम लग रहा हो वह उसी के लिए महाराज दशरथ से वनगमन का मांग कर रही है। राम लक्ष्मरण जानकी पूरे अवध को एक प्रकार से अचेत करके निकल गए है तो उनके साथ-साथ अयोध्या निवासी भी निकल पडे हैं। राजा दशरथ ने उन्हेंक लाने के लिए सुमंत्र जी को भेजा हैं। तमसा तट पर जब सभी रात्री में विश्राम कर रहे होते हैं , उसी वक्तस राम जी सुमंत्र जीे के रथ पर सवार होकर गंगा किनारे पहुंचते हैं। ’ यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥ लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥ जब निषादराज गुह ने यह खबर पाई तो उसके हृदय में हर्ष की सीमा नहीं थी। दण्डवत करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेम से प्रभु को देखने लगा। सीताजी, सुमंत्रख्‍ और भाई लक्ष्मणजी सहित कन्द.मूल-फल खाकर रघुकुल मणि श्री रामचन्द्रजी लेट गए। भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबा रहे है। दूसरके दिन नित्य कर्म के बाद श्री रामचन्द्रजी नेबड़ का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित उस दूध से सिर पर जटाएँ बनाईं। यह देखकर सुमंत्रजी के नेत्रों में जल छा गया। उनका हृदय अत्यंत जलने लगाए मुँह मलिन हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यंत दीन वचन बोले. हे नाथ! मुझे कौसलनाथ दशरथजी ने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्री रामजी के साथ जाओ। वन दिखाकर, गंगा स्नान कराकर दोनों भाइयों को तुरंत लौटा लाना। सुमंत्र जी काफी उदास है। श्री रात जी उनके संसयों को दूर कर रहे हैं। राम जी , सुमंत्र जी से कहते हैं कि आप जाकर पिताजी के चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कार के साथ ही हाथ जोड़कर बिनती करिएगा कि हे तात! आप मेरी किसी बात की चिन्ता न करें। आप भी पिता के समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं।मैं हाथ जोड़कर आप से विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकार से वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हम लोगों के सोच में दुःख न पावें। श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी के चरणों में सिर नवाकर सुमंत्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन गँवाकर लौट रहे हो। ’ रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषाद बस धुनहिं सीस पछिताहिं॥ सुमंत्र ने रथ को हांका, घोड़े श्री रामचन्द्रजी की ओर देख.देखकर हिनहिनाते हैं। यह देखकर निषाद लोग विषाद के वश होकर सिर धुन.धुनकर पछताते हैं। गंगा पार करते समय केवट और श्री राम जी प्रसंग अमृत घोलने के समान है। श्री राम केवट से नाव माँग रहे है लेकिन वह लाता नहीं है। केवट कह रहा है कि तुम्हारे चरण कमलों की धूल मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदरी स्त्री हो गई। ’ एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥ जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥ प्रभु श्री राम से केवट कह रहे है कि मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने के लिए इजाजत दीजिए। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा। अब रात जी कह रहे है कि तूम वहीं करो जिससे तुम्हा!र भला हो। ’ जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥ सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥ शिव जी पार्वती से कह रहे है कि हे भवानी। एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं और जिन्होंने वामनावतार में जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया था ,दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था, वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी गंगाजी से पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कर रहे हैं! गंगा पार करने के बाद श्री राम जी जब उतराई दे रहे थे तो उनके पास कुछ नहीं था। पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी उतारी। तब वे केवट को उतराई लेने को कहा तो केवल व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए। हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा। श्री मुरारी बापू कहते है कि केवट की चतुराई देखिए किस प्रकार भक्ति भाव में उूबकर वे दोबारा से प्रभु राम से मिलने का समय मांग लिए। फिर वे भरद्वाज मुनि के आश्रम प्रयाग पहुँचे। वहां से वे वाल्मीकि आश्रम पहुंचे। श्री रामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत किया। फिर, राम जी ने मुलि से पूछा कि मैं कहा रहूं। तो मुनि ने कहा कि, आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों वह स्थान बता दीजिए। तब मैं आपके रहने के लिए स्थान दिखाऊं। सुनिएए अब मैं वे स्थान बताता हूँ, जहाँ आप, सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास कीजिए। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक सुंदर नदियों से निरंतर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे तृप्त नहीं होते, उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है,जो आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं। तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य रूपी मेघ की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं, आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा सी भी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत के पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौंदर्य का तिरस्कार करते हैं, हे रघुनाथजी! उन लोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिए। जिनके न तो कामए क्रोध, मदए अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ हैए न राग हैए न द्वेष है और न कपटए दम्भ और माया ही है. हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए। इसके बाद महाऋषि ने कहा कि आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिएए वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है। दूसरी तर।, सुमंत्र जी लौट रहे है। व्याकुल और दुःख से दीन हुए सुमंत्रजी सोचते हैं कि श्री रघुवीर के बिना जीना धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। सुमंत्र इस प्रकार मार्ग में पछतावा कर रहे थे कि इतने में ही रथ तुरंत तमसा नदी के तट पर आ पहुँचा। मंत्री ने विनय करके चारों निषादों को विदा किया। वे विषाद से व्याकुल होते हुए सुमंत्र के पैरों पड़कर लौटे। सारा दिन एक पेड़ के नीचे बैठकर बिताया। जब संध्या हुई तब उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया और रथ को दरवाजे पर खड़ा करके वे चुपके से महल में घुसे। मंत्री ने देखकर जयजीव कहकर राजा को दण्डवत्‌ प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले. सुमंत्र! कहो राम कहाँ हैं। शोक से व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे कि सीता, राम और लक्ष्मण का संदेसा तो कहो। हे सखा! श्री राम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भाव से कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं। सुमंत्र जी कह रहे है कि मैं अपने क्लेश को कैसे कहूँ जो श्री रामजी का यह संदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गई। सारथी सुमंत्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े। राजा के प्राण कंठ में आ गए। मुरारी बापू कहते है कि इस समय राजा दशरथ से कह रहे है कि इस दीवार में तुम्हेंआ कुछ नजर आ रहा है। दशरथ जी बताते है कि मुझे यहांं श्रवण कुमार के माता पिता नहर आ रहे है। श्रवण कुमार के माता पिता ने दशरथ जी को शाप दिया था कि पुत्र वियोग में तुम्हाहरी भी मौत होगी। मुरारी बापू कह रहे है कि कर्म का फल तो सभी को भोगना पडता है। इससे ब़हमा भी बच नहीं सकते। राजा की स्थिति खराब होने लगती है। कौशल्या ने गुरू वशिष्ठब को बुला लिया। ’ राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ और राजा। हा रघुकुल को आनंद देने वाले मेरे प्राण प्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गए। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवीर! हा पिता के चित्त रूपी चातक के हित करने वाले मेघ! राम-राम कहकरराम के विरह में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गए। मुरारी बापू कहते है कि हां का मलब पुकार, आह और विश्राम है। राजा के प्राण छूटते ही गुरू वशिष्ठ ने भरत और शत्रुघन को बुलाने के लिए दूत भेजा और यह हिदायत दी कि अयोध्यार के घटना के बारे में कुछ न बताएं। उधर , भरत जीे को सपने सही नहीं आ रहे थे। उन्हेंू लग रहा था कि अयोध्याक में सभी कुछ सही नहीं है। इसलिए उन्हों ने रूद्राअभिषेक यज्ञ भी कराया। उसी समय दूर ने उनहे अयोध्याम आने की बात बताई। भरत अपने भाई के साथ अयोध्याम पहुंचते है। भरत को देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। वे माता से पूछ रहे हैं कि माता! पिताजी कहाँ हैं। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्री राम.लक्ष्मण कहाँ हैं। पिताजी स्वर्ग में हैं और श्री रामजी वन में हैं। केतु के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँस के वन में आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषों का भागी बना। भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आँसू बहाने लगीं। हे तात! किसी को दोष मत दो। विधाता मेरे सब प्रकार से उलटा हो गया है। जो इतने दुःख पर भी मुझे जिला रहा है। भरत जी कह रहे है कि कर्म, वचन और मन से होने वाले जितने पातक एवं उपपातक बड़े.छोटे पाप हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं, हे विधाता! यदि इस काम में मेरा मत हो तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें। जो वेद मार्ग को छोड़कर वाम वेद प्रतिकूल मार्ग पर चलते हैं, जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत को छलते हैं, हे माता! यदि मैं इस भेद को जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगों की गति दें। माता कौसल्याजी भरतजी के स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनों को सुनकर कहने लगीं श्री राम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण हैं और तुम भी श्री रघुनाथ को प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे जलचर जीव जल से विरक्त हो जाए। और ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे, पर तुम श्री रामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत में जो कोई ऐसा कहते हैं, वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे। फिर, राजा के अंतिम संस्का,र की तैयारी होने लगी। चंदन और अगर के तथा और भी अनेकों प्रकार के अपार सुगंध द्रव्यों के बहुत से बोझ आए। सरयूजी के तट पर सुंदर चिता रचकर बनाई गई जो ऐसी मालूम होती थी मानो स्वर्ग की सुंदर सीढ़ी हो। इस प्रकार सब दाह क्रिया की गई और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलांजलि दी। शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठजी आए और उन्होंने मंत्रियों तथा सब महाजनों को बुलवाया। राजा के इच्छाम अनुासार भरत को राजगद़दी पर बैठने के लिए कहा गया लेकिन भरत ने कहा कि हमलोगों को पहले भैया श्री राम जी के पास जाकर उनहें लाना चाहिए। लेकिन गुरू कह रहे है कि जो तुम्हारे और श्री रामचन्द्रजी के श्रेष्ठ संबंध को जान लेगा वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्री रामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुंदर स्नेह से उनकी सेवा करना। धैर्य की धुरी को धारण करने वाले भरतजी धीरज धरकरए कमल के समान हाथों को जोड़करए वचनों को मानो अमृत में डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे। पिताजी स्वर्ग में हैं, श्री सीतारामजी वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिए कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम की आशा रखते हैं। मुझे आज्ञा दीजिए मैं श्री रामजी के पास जाऊँ! मेरा हित इसी में है। सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्री रघुनाथजी के चरणों के दर्शन किए बिना मेरे जी की जलन न जाएगी। भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्री रामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्री रामवियोग रूपी भीषण विष से सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीज सहित मंत्र को सुनते ही जाग उठे। फिर सभी श्री राम को लेने चले। रास्तेे में पहले निसाद से मुलाकात हुई। निसाद ने भक्ति भावना से गुरू वशिष्ठ को प्रणाम किया और रथ पर से ही उन्हों ने उनहें आर्शीवाद दिया लेकिन जब उसी निशाद को प्रभु श्री राम के द्वारा बाद गले लगाते देखे तो उन्हेंं अपने धर्माचार्या को लेकर खेद हुआ। समाज के अंति व्याक्ति को जबतक गले न लगाया जाएश्‍ उसका उद्धार न हो तो राम राज्यस कैसे हो सकता है। मुरारी बापू कहते है कि श्री भरत जब श्री राम से मिलने जा रहे थे तो उन्हें चार प्रकार के विघ्नोंब का सामना करना पडा। चित्रकूट पहुंच कर वे पैदल चलने लगे तो सारा समाज पैदल चलने लगा। इसे देखकर माता कोशल्याा के कहने पर उसने इसलिए रथ की सवारी ली क्योंदकि समाज को वे ककष्ट देना नहीं चाहते हैं। मुरारी बापू कहते है कि व्रत रखो लेकिन गुपत रखों बाद में भीड से आगे निकल कर भरत जी ने ऐसा ही किया। उन्हें मार्ग में बाधा डालने के लिए रिद्धी-सिद्धी भी आए। आना एश्वसर्य दिखाया लेकिन वे विचलित नहीं हुए। फिर, कही राम जी भरत से मिलने के बाद अयोध्या् वापस न आ जाए इसलिए देवताओं ने भी विध्नक डालने की कोशिश की। ..और अंत में लक्ष्महण को लगा कि चतुरंगीनी सेना लेकर भरत डन दोनों भाइयों को मारने आ रहे है इसलिए उन्हें भी क्रोध हो बाया। बापू कहते है कि जब परिवार का कोई निकट संबंधी विध्न डालने की कोशिश करें तो समझ लेना चाहिए कि सत्यप की विजय हो रही है। भरत तो सत्य् आचरण को ही जी रहे थे। चित्रकूट में राम व भरत का मिलन हो रहा है। आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दुःख और दाह मिट गया। सिर पर जटा हैए कमर में मुनियों का वस्त्र बाँधे हैं और उसी में तरकस कसे हैं। सुंदर मुनि मंडली के बीच में सीताजी और रघुकुलचंद्र श्री रामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की सभा में साक्षात्‌ भक्ति और सच्चिदानंद शरीर धारण करके विराजमान हैं। छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराज समेत भरतजी का मन मग्न हो रहा है। हे नाथ! रक्षा कीजिए हे गुसाईं! रक्षा कीजिए। ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े। यह सुनते ही श्री रघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिराए कहीं तरकसए कहीं धनुष और कहीं बाण। कृपा निधान श्री रामचन्द्रजी ने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया! भरतजी और श्री रामजी के मिलन की रीति को देखकर सबको अपनी सुध भूल गई। श्री राम जी अयोध्याम लोटने के लिए भरत जी औश्र सभासद निवेदन कर रहे है..और अंत में बहुत वार्तालाप के बाद सभासदों ने कहा कि इसका निपटारा दोनों भाई ही करेंगे। बहुतों प्रकार से समझाने के बाद भरत वापस लौटने को तैयार होते है लेकिन राज्यर चलाने के लिए वे श्री राम जी का पादुका उन्सेद मांग लाते है। अयोध्या पहुंच की पादुका की स्था पना की जाती है और फिर गुरू वशिष्ठा और माता कोशल्य की आज्ञा के बाद ऋषि वेश में वे नंदीग्राम रहले चले जाते है। इसके बाद श्री राम पंचवटी आते है और यहां नरलीला करते है। वे सीता जी को अग्नि में समाने के लिए कहकर उस मृग का पीछा कर रहे है जिसे सीता जी ने लाने के लिए भगवान श्री राम से कही है। समय पाकर रावण सीता जी को हर कर ले जाते है। रास्तेए में जटायू उनका रास्ता रोकने की कोशिश करते है लेकिन असफल होते है। सीता के वियोग में श्री राम ललित नरलीला कर रहे है। यहीं उसकी मुलाकात जटायू से हो रही है। जटायू ने सीता जी को रावण द्वारा ले जाने की बात कह कर अपना प्राण त्याेग देते है। जटायू का विधिवत संस्काीर कर के सीता की खोज में वे कंबज नाम के राक्षण को निर्वाण देते है। इसके बाद उनकी मुलाकात माता सबरी से होती है। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार.बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया। फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गईं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ। श्री रघुनाथजी ने कहा. हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूं। और राम जी कहते हैं कि ’ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥ जाति, पांति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता। इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादलदिखाई पड़ता है। मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम। तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें।राम मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास, यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह शील ,अच्छा स्वभाव निरंतर संत पुरुषों के धर्म आचरण में लगे रहना। सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना। नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो,हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है। ’ कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥ सब कथा कहकर भगवान्‌ के मुख के दर्शन कर, उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्याग कर शबरी उस लोक गई जो कईयों के लिए मुश्किल है। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत से मत, ये सब शोकप्रद हैं हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्री रामजी के चरणों में प्रेम करो। इसके बाद श्री राम जी आगे बढते है। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर सुग्रीव अत्यंत भयभीत हो जाते है। वे हनुमान से कहते हैं कि हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। अपने हृदय में उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारे से समझाकर कह देना। हनुमान जी, दोनों भाइयों से मिलकर और सभी प्रकार से संतुष्ट होकर उन्हेंद वे सुग्रीव से मिलाने ले आते है। अग्नि का साक्षी मानकार दोनों की मैत्री होती है। फिर, श्री राम बालि का वधकर सुग्रीव को राजा बनाते है और बालि के पुत्र अंगद को बनाते है। चार माह के बाद सीता जी को खोजने के लिए चार गुट बनाए जाते है। हनुमान जी, अंगद और जामवंत आदि सीता जी को खोजने के लिए दक्षिणदिशा जाते है। जाते वक्तज ज्ञर राम ने हनुमान जी के मांगने पर अपनी मुद्रिका पहचान के लिए दे दी थी। समुद्र के किनारे समपाती के कहने पर की लंका में सीता जी अशोक वाटिका में बैठी है। सभी में हर्ष फैल जाता है लेकिन, समुद्र को लांघना किसके बूते की बात है। इसी पर सभी परेशान है। अगंद कह रहे है कि मैं पहुंच तो जाउंगा लेकिन वापसी मुश्किल है। जाम्बवान्‌ कहने लगे मैं बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं रहा। जब खरारि खर के शत्रु श्री राम वामन बने थे तब मैं जवान था और मुझ में बड़ा बल था। बलि के बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीर का वर्णन नहीं हो सकता किंतु मैंने दो ही घड़ी में दौड़कर उस शरीर की सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं। फिर वे, हनुमान जी को चुपचाप देख कर उनके पास जाते है। ’ कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा, हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है। तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो। जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वत के आकार के अत्यंत विशालकाय हो गए। हनुमान्‌जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा कि मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूं। सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्‌! मैं तुमसे पूछता हूं तुम मुझे उचित सीख देना कि मुझे क्या करना चाहिए। यहां मुरारी बापू बताते है कि यह संवाद काफी रोचक है। युवाओं में शक्ति है और बुजुर्गों के पास अनुभव। दोनों मिल जाए तो रामराज्या की स्थाापना हो जाए। यहां जाम्बवान्‌ ने कहा कि हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामजी अपने बाहुबल से राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे। ’ जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ जाम्बवान्‌ के सुंदर वचन सुनकर हनुमान्‌जी के हृदय को बहुत ही भाए। वे बोले, हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर, कन्द.मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना। जब तक मैं सीताजी को देखकर लौट न आऊँ। काम अवश्य होगा क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले। लंका पहुंचने के बाद सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान्‌जी भय त्यागकर उस पर दौड़कर जा चढ़े। शिवजी कहते हैं कि हे उमा! इसमें वानर हनुमान्‌ की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। बहुत ही बड़ा किला है कुछ कहा नहीं जाता। ’ प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है शत्रु मित्रता करने लगते हैं। समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है। हनुमान जी ने प्रत्येक महल की खोज की। रावण के महल में गए। लेनिन सीता जी दिखाई नहीं दे रही थी। उसी समय विभीषणजी जागे। वे राम नाम का स्मरण कर रहे थे। हनमान्‌जी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। वहीं से उनहोंने सीता जी के बारे में जानकारी मिली। हनुमान अशोकवाटिका पहुंचे जिस वृक्ष्‍ के नीचे सीता जी बैठी थी। उसी समय वहां रावण आकर अपना भय दिखाकर वापस चला गया। सीता जी को व्याठकुल देखकर हनुमान्‌जी ने हदय में विचार कर सीताजी के सामने अँगूठी डाल दी। मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। यह समझकरद्ध सीताजी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया। तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं। ’ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ वे सोच रही है कि श्री रघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं। माया से ऐसी अँगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्‌जी श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिनके सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। फिर हनुमान जी बताया कि किस प्रकार से नर और वानर की मुलाकात हुई। फिर, उन्होंगने सीता मैया से वहां के उपवन में लकर फल खाने की इच्छाका जाहिर की। आज्ञा मिलते ही हनुमान जी ने फल खाने लगे। इसे देखकर राक्षण उनपर हमला करने लगे। उन्होंहने कई राक्षसों को मार डाला। फिर रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा। हनुमान जी उसकर भी वध कर दिया। फिर, इंद्रजीत उन्हें् बांध कर ले गए। मुरारी बापू बताते है कि हनुमान जो स्वैयं शिव थे वे देखना चाह रहे थे कि मेरा चेला किस प्रकार रह रहा है। फिर, हनुमान जी को दंड देने के लि ए उनके पूंछ में आग लगाई गई। उनके पूंछ को बांधने में लंका के सभी कपडे और घी समापत हो गए। हनुमान जी ने पूरे लंका में आग लगा दी फिर सिंधू में कूद गए। वहां से माता सीता के पास आए और माता ने पूछा कि यह आग कैसी है। मुरारी बापू बताते है कि माता यह आग मेरे पिताजी पवन ले लगाई है। नहीं माता यह आग भगवान के प्रताप ने लगाई है। ..नहीं मां यह आग आपके संताप ने लगाई है। नहीं मां, यह आग रावण के पाप ने लगाई है। इसे बाद हनुमान जी चुडामणि लेकर राम जी के पास आते है। फिर, सभी लंका के और प्रसथान करते है। इसी कर्म में समुदं के पास पहुंचते है। समुद्र द्वारा नल और नील के बारे में बताया जाता है कि यह जिस पत्थ।र को छुएंगे वह समुद्र पर तैरने लगेगा। सेतू का निर्माण होता है। वहां रामेश्वथर में भगवान राम स्व्यं महादेव की स्थाापना करते हैं। सेना लंका पहुंचती है। अंगद जी , दूत बनकर रावण के पास जाते है लेकिन शांति संधि को रावण नहीं मानता और बाद में युद्ध में कूल समेत मारा जाता है। दोबारा अग्नि से माता सीता राम जी को प्राप्तर होता है। राम जी जब मृग के पीदे गए थे उस वक्तन उन्हों ने सीता जी से कहा थी कि तुम अब अग्नि में प्रवेश कर जाओ। हमे नरलीला करनी है। फिर, सभी अयोघ्याि पहुंत है। वहां राम राज्ये कर स्था पना होती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्री रामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं। वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्री रामजी के परम धाम को चले जाते हैं। जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर उनको हृदय में धारण कर लेता है उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न विकारों को श्री रामजी हरण कर लेते हैं। सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं ऐसे एक श्री रामचंद्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम निःस्वार्थ हित करने वाला सुहृद्द् और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है। यह श्री रामचरित मानस पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानसरोवर में गोता लगाते हैं वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते। ---------------------------------------

औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥

उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥ नई दिल्लीभ, 06 फरवरी ( कविलाश मिश्र)। दिल्ली के राजघाट पर चल रहे राम कथा के आंठवे दिन संत मुरारी बापू ने संत और असंत के लक्षणों मानस औ महात्मा गांधी के विचारों के द्वारा बताया। साथ ही उन्हों ने इस दौरान नारद और प्रभु राम के उस प्रसंग का भी उल्लेेख किया जिसमें नारद प्रभु राम से संत व असंत के लक्षणों को बताते हैं। उन्होंकने नवयुवाओं से भी आग्रह किया कि जब भी मौका मिले अपने आराध्यष का स्महरण करना चाहिए। इसके लिए क्याआ दिन और क्याौ रात। मुरारी बापू कहते है कि जिस लक्षणों के कारण मैं उनके अधीन हो जाता हूं। वे आगे बताते हैं कि जिसको मंहत बनने को कभी इच्छाक न हो वह संत हैं। संत वह है जिसका कोई अंत नहीं हैं। कथा के दौरान बापू शिव धनुष भंग, जानकी विवाह, विदाई सहित राजा दशरथ के आयौध्याे आने को लेकर ज्ञान के सरोबर में भक्तोंव को गोता लगाते रहते हैं। नारद मुनि भगवान श्री राम से संतों के लक्षणों के बारे में पूंछ रहे हैं। ’ संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ। हे रघुवीर! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिए! श्री रामजी कहते हैं मैं संतों के गुणों को कहता हूँ जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूं। संत काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, इन छह विकारों से दूर रहते हैं। वे पापरहित, कामनारहित, निश्चल , सर्वत्यागी, बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, दूसरों को मान देने वाले, अभिमानरहित, धैर्यवान, धर्म के ज्ञान और आचरण में अत्यंत निपुण होते हैं। मेरे चरण कमलों को छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही। संत कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं। उनका सरल स्वभाव होता हैं और सभी से प्रेम रखते हैं। वैराग्य, विवेक, विनय, परमात्मा के तत्व का ज्ञान और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते। ’ कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे। अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥ सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए। ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥ जिनके गुणों का वर्णण शेष जी व शारदा जी भी नहीं कर सकते । भगवान्‌ के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोक को चले गए। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं जो सब आशा छोड़कर केवल श्री हरि के रंग में रँग गए हैं। मुरारी बापू, शिव उमा के एक प्रसंग को सुनाते हुए बताते हैं कि शिवजी , उमा को बता रहे हैं कि इंष्याष, निंदा और द्वेष जो न करे वे संतों के श्रेणी में आते हैं। कल की कथा को आगे बढाते हुए मुरारी बापू कहते हैं कि सीता स्वइयंवर को लेकर राजा जनक द्वारा दिए गए निमंत्रण पर गुरू विश्वामित्र श्री राम-लक्ष्मण सहित यज्ञशाला में प्रवेश करते हैं। विश्वामित्र कहते हैं कि देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। इस पर लक्ष्मणजी कहते हैं कि हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी धनुष तोड़ने का श्रेय उसी को प्राप्त होगा। रंगभूमि में दोनों भाई आने की सूचना मिलते ही नगर निवासी रंगभूमि की ओर चले। बड़ी भीड़ देखकर जनकजी ने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवाकर सब किसी को यथायोग्य आसन देने को कहा। उसी समय श्री राम और लक्ष्मण वहाँ आए। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर प्रतीत हो रहे हैं।यज्ञशाला में आने महान रणधीर राजा श्री रामचन्द्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों जबकि कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो। छल से जो राक्षस वहाँ राजाओं के वेष में बैठे उन्हें प्रभु काल के समान दिखाई दे रहे थे। विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए। जनक समेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं। उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। सीताजी जिस भाव से श्री रामचन्द्रजी को देख रही हैं वह स्नेह और सुख तो कहने में ही नहीं आता। उस स्नेह और सुख का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं। वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥ इस प्रकार जिसका जैसा भाव था प्रभु श्री राम उन्हेंे उसी रूप में दिखाई दे रहे थे। जनकजी जाकर मुनि के चरण कमल पकड़ लिए। दोनों भाइयों को देखकर वे हर्षित हो रहे है। वे मुनि को अपनी कथा सुनाते है और दोनों भाइयों के साथ मुनि को सारी रंगभूमि दिखला रहे है। वहां सबने रामजी को अपनी-अपनी ओर ही मुख किए हुए देखा परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। ’ प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेश उदय भएँ तारे॥ असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥ शिव जी पार्वती जी से कह रहे है कि हे भवानी। रंगशाला में प्रीाु की उपस्थिति से ही सभी ने हार मान ली हैं। प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए हैं। प्रभु के तेज को देखकर सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं हैं। ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेम मग्न होकर श्री रामजी का अनुपम रूप देख रहे हैं। देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुंदर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं। तब सुअवसर जानकर जनकजी ने सीताजी को बुला भेजा। ’ सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥ यहां तुलसी दास जी कहते हैं कि रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिए मुझे काव्य की सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं। कवि लोग उन उपमाओं को देते हैं जो जगत की स्त्रियों के अंगों को दी जाती हैं। उन्हें भगवान की स्वरूपा शक्ति श्री जानकीजी के अप्राकृतए चिन्मय अंगों के लिए प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपने को उपहासास्पद बनाना है। सयानी सखियाँ सीताजी को साथ लेकर मनोहर वाणी से गीत गाती हुई चलीं। सीताजी के नवल शरीर पर सुंदर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननी की महान छबि अतुलनीय है। शिवजी का धुनष उठाने का पर्यत्नर वहां स्वीयंवर में आए राजाओं ने शुरू किया लेकिन धनुष तस से मस नहीं हुआ। मुरारीबापू कहते है कि शिवजी का वह धनुष कैसे नहीं डिगता था जैसे कामी पुरुष के वचनों से सती का मन कभी चलायमान नहीं होता। जैसे वैराग्य के बिना संन्यासी उपहास के योग्य हो जाता है वैसे ही सब राजा उपहास के योग्य हो गए। राजाओं को असफल देखकर जनक अकुला जाते हैं और मानो क्रोध में सने हुए बोल रहे हैं कि मैंने जान लियाए पृथ्वी वीरों से खाली हो गई। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता। माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥ ’ कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ उमा से शिव जी कह रहे है कि वैदेही जनक के वचन सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। लेकिन, रघुवीरजी के डर से कुछ कह नहीं पा रहे हैं लेकिन प्रभु राम के चरण कमलों में सिर नवाकर वे बोल रहे हैं कि यह अनुचित वचन रघुकुल शिरोमणि श्री रामजी को उपस्थित जानते हुए भी जनकजी ने कहे हैं। लक्ष्मुण जी राम जी से आज्ञा मांग रहे हैं कि आपके प्रताप की महिमा से यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ। इसमें कही भी लक्ष्मीण जी का घमंड नजर नहीं आ रहा है। उनका स्वडभाव ही ऐसा है। वे कह भी रहे हैं कि प्रभु श्री राम की महिमा ही ऐसी है , यह घमंड से नहीं कह रहा हूं। यदि प्रभु आज्ञा दे तो उनके महिमा से धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ाकर उसे सौ योजन तक दौड़ा लिए चला जाऊँ। ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोध भरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओं के हाथी कांपने लगे। सीताजी के हृदय में हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गए। लेकिन, श्री रामचन्द्रजी ने इशारे से लक्ष्मण को मना किया और प्रेम सहित अपने पास बैठा लिया। उसी वक्तस गुरू विश्वामित्रजी कह रहे हैं कि उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥ हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात! जनक का संताप मिटाओ। गुरु के वचन सुनकर श्री रामजी ने चरणों में सिर नवाया। प्रेम सहित गुरु के चरणों की वंदना करके श्री रामचन्द्रजी ने मुनियों से आज्ञा माँगी। उधर, श्री रामचन्द्रजी को देखकर सीताजी भयभीत हृदय से देवताओं से विनती कर रही हैं। वे व्याकुल होकर मन ही मन कह रही है कि हे महेश.भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिए और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिए। इधर जब लक्ष्मणजी ने देखा कि रघुकुल मणि श्री रामचन्द्रजी ने शिवजी के धनुष की ओर ताका है तो वे शरीर से पुलकित हो ब्रह्माण्ड को चरणों से दबाकर बोल रहे हैं कि हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वी को थामे रहो, जिससे यह हिलने न पावे। श्री रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ। श्री रामजी ने जानकीजी को बहुत ही विकल देखा। मन ही मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। उन्हों ने धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा इसका किसी को पता नहीं लगा। सबने यही देखा कि श्री रामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। सारे ब्रह्माण्ड में जयजयकार की ध्वनि छा गई। जनकजी ने सोच त्याग कर सुख प्राप्त किया। जयमाला के समय सीता जी के हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो डंडियों सहित दो कमल चन्द्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हों। सीताजी ने श्री रामजी के गले में जयमाला पहना देती हैं। श्री रघुनाथजी के हृदय पर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। श्री सीता-रामजी की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हों। उसी वक्तग भगवान परशुराम वहां आते हैं। जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया। उनकी सुंदर जोड़ी देखकर परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। लेकिन, धनुष के टुकड़े पृथ्वी पर पड़े हुए दिखाई देने पर अत्यन्त क्रोध में भरकर वे कठोर वचन बोले। रे मूर्ख जनक! बता धनुष किसने तोड़ा। उसे शीघ्र दिखाए नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँ तक तेरा राज्य हैए वहाँ तक की पृथ्वी उलट दूँगा। लक्ष्मीण जी और परशुश्राम जी के बीच बढ रहे विवाद को प्रभु श्री राम ने अपने वचनों से कम किया। श्री रामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले, हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं। आप बालक के वचन पर कान न दीजिए। श्री रामचन्द्रजी ने कहा. हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िए। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है जिस प्रकार आपका क्रोध जाएए हे स्वामी! वही कीजिए। हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैंए तो यह सत्य सुनिएए फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवाएं। श्री रघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गए। परशुरामजी ने कहा हे राम! हे लक्ष्मीपति! लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष हाथ में लीजिए और इसे खींचिए। जिससे मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी धनुष देने लगेएतब वह आप ही चला गया। तब उन्हों ने कहा कि हे राक्षसों के कुल रूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गो का हित करने वाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरने वाले! आपकी जय हो। शिव जी कहते है कि प्रभु श्री राम के निवेदन और विश्वा मिश्र जी के कहने के बाद राजा जनक ने दशरथजी के पास दूत भेजा। अयोध्या से बारात ने प्रस्थान किया। बारातियों कें सत्काेर के लिए बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाए जा रहे है। मुरारी बापू कहते है कि जहां माता जानकी और प्रभु श्रीराम की शादी हो रही हो उस नगर में भला क्याा कमी रह सकती है। मंगल कलश अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥ ’ दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥ जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥ ’ दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोग उजागर॥ अनेकों मंगल कलश और सुंदर ध्वजा, परदे और चँवर बनाए जा रहे है। मंडप की अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्मा का मन भी भूल गया। तुलसीदास जी कहते है कि जिस मंडप में श्री जानकीजी दुलहिन होंगी, किस कवि की ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके। जिस मंडप में रूप और गुणों के समुद्र श्री रामचन्द्रजी दूल्हे होंगे वह मंडप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। जिस नगर में साक्षात्‌ लक्ष्मीजी स्त्री का सुंदर वेष बनाकर बसती हैं उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं। समाचार मिलते ही अयौघ्यार में ही आनंद का माहौल हैं। राजा दशरथ ने राजा ने सारे रनिवास को बुलाकर जनकजी की पत्रिका बाँचकर सुनाई। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गईं। राजा ने फिर दूसरी सब बातों वर्णन किया। चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्री रघुनाथजी का विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गए और रास्ते घर तथा गलियाँ सजाने लगे। दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है जहाँ समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है। रथों पर चढ़.चढ़कर बारात नगर के बाहर जुटने लगी। सुंदर रथ पर राजा वशिष्ठजी को हर्ष पूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी और गणेशजी का स्मरण करके दूसरे रथ पर चढ़े। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुंदर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे। सूर्यवंश के पताका स्वरूप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी ने नदियों पर पुल बँधवा दिए। बीच-बीच में ठहरने के लिए सुंदर घर बनवा दिए जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छाई है। बड़े जोर से बजते हुए नगाड़ों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात को आती हुई जानकर अगवानी करने वाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले। ’ मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥ ब्रह्माजी ने स्वोयं मंगलों का मूल लग्न का दिन देखा। हेमंत ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं। गायों के खुर से धूल उडे ऐसी बेला शादी के मुर्हुत के लिए तय की गई। निर्मल और सभी सुंदर मंगलों की मूल गोधूलि की पवित्र बेला आ गई। सुंदर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं। ’ सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥ सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥ शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द टोलियाँ बना-बनाकर विमानों पर जा चढ़े। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन सबको अपने.अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे हैं। शिव जी कहते है कि जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष मुट्ठी में आ जाते हैं ये वही जगत के माता-पिता श्री सीतारामजी हैं। नख से शिखा तक श्री रामचन्द्रजी के सुंदर रूप को बार.बार देखते हुए पार्वतीजी सहित श्री शिवजी का शरीर पुलकित हो गया है। ’ जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥ संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥ जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्री रामचन्द्रजी सवार हैं उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्री रामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे। श्री रामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुएए पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे। श्रेष्ठ देवांगनाएँ जो सुंदर मनुष्य स्त्रियों के वेश में हैं सभी स्वभाव से ही सुंदरी और श्यामा सोलह वर्ष की अवस्था वाली हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहिचान के ही वे सबको प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं। ’ चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥ ’ सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ कुल गुरू वशिष्ठन जी और जनक के कुल गुरू शादी करवा रहें है। श्री रामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जा रही है। दशरथजी मन में बहुत आनंदित हो रहे है। उसी समय, वशिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुश ध्वज की बड़ी कन्या माण्डवीजी को भरतजी को ब्याह दिया। जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुंदरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुंदर नेत्रों वाली, सुंदर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया। देवतागण फूल बरसा रहे हैंए राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनिए जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही हैए आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है। मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं। विवाह से बहुत पहले की बारात आ गई थी और मिथिला नरेश जनक जी और उनके परिवार के विशेष आग्रह पर बारात विव‍ाह के बाद भी काफी दिनों तक रूकी रही। राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं। प्रतिदिन सबेरे उठकर अयोध्या नरेश विदा माँगते हैं। पर जनकजी उन्हें प्रेम से रख लेते हैं। इस प्रकार बहुत दिन बीत गएए मानो बाराती स्नेह की रस्सी से बँध गए हैं। तब विश्वामित्रजी और शतानंदजी ने जाकर राजा जनक को समझाकर कहा कि अब दशरथजी को आज्ञा दीजिए। जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जाएगी तब वे व्याकुल होकर एक.दूसरे से बात पूछने लगे। जाना सत्य है यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गए मानो संध्या के समय कमल सकुचा गए हों। फिर, जानकी के विदाई का समय आ गया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गईं मानो थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों। वे बार-बार सीताजी को गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं। ’ सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥ अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥ आदर के साथ सब पुत्रियों को स्त्रियों के धर्म समझाकर रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्री जाति को क्यों रचा। जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल.पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था वे व्याकुल होकर कह रहे हैं। वैदेही कहाँ हैं, ऐसा पूछ रहे है। तब भाई सहित जनकजी वहाँ आए। मुरारी बापू कहते हैं कि जनक जी विवेकी हैं, विदेही है। उनपर ममता आशक्त नहीं होती लेकिन सीताजी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजा ने जानकीजी को हृदय से लगा लिया। प्रेम के प्रभाव से, ज्ञान की महान मर्यादा मिट गई ,ज्ञान का बाँध टूट गया। राजा ने सुंदर मुहूर्त जानकर सिद्धि सहित गणेशजी का स्मरण करके कन्याओं को पालकियों पर चढ़ाया। ’ सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥ भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥ सीताजी के चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो रहे हैं। मुरारी बापू कहते है कि बे‍ब्‍ी को सबसे ज्यावदा चिंता पिता की होती है। विदाई बेला में मां जानकी अपने माता-पिता को ढांडस बंधा रही है कि आपलोग परेशान मत होइएगा। हमारे साथ मेरी तीन बहनें भी हैं। हमलोग रघुकुल जा रहे है। ऐसा कहत कर मां जानकी रोने लगती है। फिर, अपनी मां सुनयना से कहती है कि माता आप पिताजी को विशेष ख्यारल रख्एिगा। इसके बाद बारात वधुएं सहित अयौघ्या नगरी पहुंची। अवध में नित्य ही मंगल, आनंद और उत्सव हो रहे हैं। इस तरह आनंद में दिन बीतते जाते हैं। दिनोंदिन राजा का सौ गुना भाव प्रेम देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं। अंत में जब विश्वामित्रजी ने विदा माँगी तब राजा प्रेममग्न हो गए और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गए। वे बोले., हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूं। हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहिएगा और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़ते है। और, मुनि तो मुनि होते है। मुरारी बापू कहते है कि जिस प्रकार से राम -लक्ष्महण को लेने के लिए विश्वामित्रजी आए थे उसी प्रकार लौट गए। मुनियें को धन-संपदा की क्यात जरूरत। जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आएए तब से सब प्रकार का आनंद अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में आनंद.उत्साह हुआए उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि तुलसी दास कहते है कि श्री रघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है,जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे वे लोग श्री जानकीजी और श्री रामजी की कृपा से सदा सुख पावेंगे।

उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥

नई दिल्ली, ( कविलाश मिश्र)। दिल्ली के राजघाट पर चल रहे राम कथा के आंठवे दिन संत मुरारी बापू ने संत और असंत के लक्षणों मानस औ महात्मा गांधी के विचारों के द्वारा बताया। साथ ही उन्हों ने इस दौरान नारद और प्रभु राम के उस प्रसंग का भी उल्लेेख किया जिसमें नारद प्रभु राम से संत व असंत के लक्षणों को बताते हैं। उन्होंकने नवयुवाओं से भी आग्रह किया कि जब भी मौका मिले अपने आराध्यष का स्महरण करना चाहिए। इसके लिए क्याआ दिन और क्याौ रात। मुरारी बापू कहते है कि जिस लक्षणों के कारण मैं उनके अधीन हो जाता हूं। वे आगे बताते हैं कि जिसको मंहत बनने को कभी इच्छाक न हो वह संत हैं। संत वह है जिसका कोई अंत नहीं हैं। कथा के दौरान बापू शिव धनुष भंग, जानकी विवाह, विदाई सहित राजा दशरथ के आयौध्याे आने को लेकर ज्ञान के सरोबर में भक्तोंव को गोता लगाते रहते हैं। नारद मुनि भगवान श्री राम से संतों के लक्षणों के बारे में पूंछ रहे हैं। ’ संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ। हे रघुवीर! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिए! श्री रामजी कहते हैं मैं संतों के गुणों को कहता हूँ जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूं। संत काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, इन छह विकारों से दूर रहते हैं। वे पापरहित, कामनारहित, निश्चल , सर्वत्यागी, बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, दूसरों को मान देने वाले, अभिमानरहित, धैर्यवान, धर्म के ज्ञान और आचरण में अत्यंत निपुण होते हैं। मेरे चरण कमलों को छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही। संत कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं। उनका सरल स्वभाव होता हैं और सभी से प्रेम रखते हैं। वैराग्य, विवेक, विनय, परमात्मा के तत्व का ज्ञान और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते। ’ कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे। अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥ सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए। ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥ जिनके गुणों का वर्णण शेष जी व शारदा जी भी नहीं कर सकते । भगवान्‌ के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोक को चले गए। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं जो सब आशा छोड़कर केवल श्री हरि के रंग में रँग गए हैं। मुरारी बापू, शिव उमा के एक प्रसंग को सुनाते हुए बताते हैं कि शिवजी , उमा को बता रहे हैं कि इंष्याष, निंदा और द्वेष जो न करे वे संतों के श्रेणी में आते हैं। कल की कथा को आगे बढाते हुए मुरारी बापू कहते हैं कि सीता स्वइयंवर को लेकर राजा जनक द्वारा दिए गए निमंत्रण पर गुरू विश्वामित्र श्री राम-लक्ष्मण सहित यज्ञशाला में प्रवेश करते हैं। विश्वामित्र कहते हैं कि देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। इस पर लक्ष्मणजी कहते हैं कि हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी धनुष तोड़ने का श्रेय उसी को प्राप्त होगा। रंगभूमि में दोनों भाई आने की सूचना मिलते ही नगर निवासी रंगभूमि की ओर चले। बड़ी भीड़ देखकर जनकजी ने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवाकर सब किसी को यथायोग्य आसन देने को कहा। उसी समय श्री राम और लक्ष्मण वहाँ आए। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर प्रतीत हो रहे हैं।यज्ञशाला में आने महान रणधीर राजा श्री रामचन्द्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों जबकि कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो। छल से जो राक्षस वहाँ राजाओं के वेष में बैठे उन्हें प्रभु काल के समान दिखाई दे रहे थे। विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए। जनक समेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं। उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। सीताजी जिस भाव से श्री रामचन्द्रजी को देख रही हैं वह स्नेह और सुख तो कहने में ही नहीं आता। उस स्नेह और सुख का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं। वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥ इस प्रकार जिसका जैसा भाव था प्रभु श्री राम उन्हेंे उसी रूप में दिखाई दे रहे थे। जनकजी जाकर मुनि के चरण कमल पकड़ लिए। दोनों भाइयों को देखकर वे हर्षित हो रहे है। वे मुनि को अपनी कथा सुनाते है और दोनों भाइयों के साथ मुनि को सारी रंगभूमि दिखला रहे है। वहां सबने रामजी को अपनी-अपनी ओर ही मुख किए हुए देखा परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। ’ प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेश उदय भएँ तारे॥ असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥ शिव जी पार्वती जी से कह रहे है कि हे भवानी। रंगशाला में प्रीाु की उपस्थिति से ही सभी ने हार मान ली हैं। प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए हैं। प्रभु के तेज को देखकर सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं हैं। ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेम मग्न होकर श्री रामजी का अनुपम रूप देख रहे हैं। देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुंदर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं। तब सुअवसर जानकर जनकजी ने सीताजी को बुला भेजा। ’ सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥ यहां तुलसी दास जी कहते हैं कि रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिए मुझे काव्य की सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं। कवि लोग उन उपमाओं को देते हैं जो जगत की स्त्रियों के अंगों को दी जाती हैं। उन्हें भगवान की स्वरूपा शक्ति श्री जानकीजी के अप्राकृतए चिन्मय अंगों के लिए प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपने को उपहासास्पद बनाना है। सयानी सखियाँ सीताजी को साथ लेकर मनोहर वाणी से गीत गाती हुई चलीं। सीताजी के नवल शरीर पर सुंदर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननी की महान छबि अतुलनीय है। शिवजी का धुनष उठाने का पर्यत्नर वहां स्वीयंवर में आए राजाओं ने शुरू किया लेकिन धनुष तस से मस नहीं हुआ। मुरारीबापू कहते है कि शिवजी का वह धनुष कैसे नहीं डिगता था जैसे कामी पुरुष के वचनों से सती का मन कभी चलायमान नहीं होता। जैसे वैराग्य के बिना संन्यासी उपहास के योग्य हो जाता है वैसे ही सब राजा उपहास के योग्य हो गए। राजाओं को असफल देखकर जनक अकुला जाते हैं और मानो क्रोध में सने हुए बोल रहे हैं कि मैंने जान लियाए पृथ्वी वीरों से खाली हो गई। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता। माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥ ’ कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ उमा से शिव जी कह रहे है कि वैदेही जनक के वचन सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। लेकिन, रघुवीरजी के डर से कुछ कह नहीं पा रहे हैं लेकिन प्रभु राम के चरण कमलों में सिर नवाकर वे बोल रहे हैं कि यह अनुचित वचन रघुकुल शिरोमणि श्री रामजी को उपस्थित जानते हुए भी जनकजी ने कहे हैं। लक्ष्मुण जी राम जी से आज्ञा मांग रहे हैं कि आपके प्रताप की महिमा से यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ। इसमें कही भी लक्ष्मीण जी का घमंड नजर नहीं आ रहा है। उनका स्वडभाव ही ऐसा है। वे कह भी रहे हैं कि प्रभु श्री राम की महिमा ही ऐसी है , यह घमंड से नहीं कह रहा हूं। यदि प्रभु आज्ञा दे तो उनके महिमा से धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ाकर उसे सौ योजन तक दौड़ा लिए चला जाऊँ। ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोध भरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओं के हाथी कांपने लगे। सीताजी के हृदय में हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गए। लेकिन, श्री रामचन्द्रजी ने इशारे से लक्ष्मण को मना किया और प्रेम सहित अपने पास बैठा लिया। उसी वक्तस गुरू विश्वामित्रजी कह रहे हैं कि उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥ हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात! जनक का संताप मिटाओ। गुरु के वचन सुनकर श्री रामजी ने चरणों में सिर नवाया। प्रेम सहित गुरु के चरणों की वंदना करके श्री रामचन्द्रजी ने मुनियों से आज्ञा माँगी। उधर, श्री रामचन्द्रजी को देखकर सीताजी भयभीत हृदय से देवताओं से विनती कर रही हैं। वे व्याकुल होकर मन ही मन कह रही है कि हे महेश.भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिए और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिए। इधर जब लक्ष्मणजी ने देखा कि रघुकुल मणि श्री रामचन्द्रजी ने शिवजी के धनुष की ओर ताका है तो वे शरीर से पुलकित हो ब्रह्माण्ड को चरणों से दबाकर बोल रहे हैं कि हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वी को थामे रहो, जिससे यह हिलने न पावे। श्री रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ। श्री रामजी ने जानकीजी को बहुत ही विकल देखा। मन ही मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। उन्हों ने धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा इसका किसी को पता नहीं लगा। सबने यही देखा कि श्री रामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। सारे ब्रह्माण्ड में जयजयकार की ध्वनि छा गई। जनकजी ने सोच त्याग कर सुख प्राप्त किया। जयमाला के समय सीता जी के हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो डंडियों सहित दो कमल चन्द्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हों। सीताजी ने श्री रामजी के गले में जयमाला पहना देती हैं। श्री रघुनाथजी के हृदय पर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। श्री सीता-रामजी की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हों। उसी वक्तग भगवान परशुराम वहां आते हैं। जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया। उनकी सुंदर जोड़ी देखकर परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। लेकिन, धनुष के टुकड़े पृथ्वी पर पड़े हुए दिखाई देने पर अत्यन्त क्रोध में भरकर वे कठोर वचन बोले। रे मूर्ख जनक! बता धनुष किसने तोड़ा। उसे शीघ्र दिखाए नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँ तक तेरा राज्य हैए वहाँ तक की पृथ्वी उलट दूँगा। लक्ष्मीण जी और परशुश्राम जी के बीच बढ रहे विवाद को प्रभु श्री राम ने अपने वचनों से कम किया। श्री रामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले, हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं। आप बालक के वचन पर कान न दीजिए। श्री रामचन्द्रजी ने कहा. हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िए। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है जिस प्रकार आपका क्रोध जाएए हे स्वामी! वही कीजिए। हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैंए तो यह सत्य सुनिएए फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवाएं। श्री रघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गए। परशुरामजी ने कहा हे राम! हे लक्ष्मीपति! लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष हाथ में लीजिए और इसे खींचिए। जिससे मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी धनुष देने लगेएतब वह आप ही चला गया। तब उन्हों ने कहा कि हे राक्षसों के कुल रूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गो का हित करने वाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरने वाले! आपकी जय हो। शिव जी कहते है कि प्रभु श्री राम के निवेदन और विश्वा मिश्र जी के कहने के बाद राजा जनक ने दशरथजी के पास दूत भेजा। अयोध्या से बारात ने प्रस्थान किया। बारातियों कें सत्काेर के लिए बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाए जा रहे है। मुरारी बापू कहते है कि जहां माता जानकी और प्रभु श्रीराम की शादी हो रही हो उस नगर में भला क्याा कमी रह सकती है। मंगल कलश अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥ ’ दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥ जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥ ’ दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोग उजागर॥ अनेकों मंगल कलश और सुंदर ध्वजा, परदे और चँवर बनाए जा रहे है। मंडप की अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्मा का मन भी भूल गया। तुलसीदास जी कहते है कि जिस मंडप में श्री जानकीजी दुलहिन होंगी, किस कवि की ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके। जिस मंडप में रूप और गुणों के समुद्र श्री रामचन्द्रजी दूल्हे होंगे वह मंडप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। जिस नगर में साक्षात्‌ लक्ष्मीजी स्त्री का सुंदर वेष बनाकर बसती हैं उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं। समाचार मिलते ही अयौघ्यार में ही आनंद का माहौल हैं। राजा दशरथ ने राजा ने सारे रनिवास को बुलाकर जनकजी की पत्रिका बाँचकर सुनाई। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गईं। राजा ने फिर दूसरी सब बातों वर्णन किया। चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्री रघुनाथजी का विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गए और रास्ते घर तथा गलियाँ सजाने लगे। दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है जहाँ समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है। रथों पर चढ़.चढ़कर बारात नगर के बाहर जुटने लगी। सुंदर रथ पर राजा वशिष्ठजी को हर्ष पूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी और गणेशजी का स्मरण करके दूसरे रथ पर चढ़े। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुंदर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे। सूर्यवंश के पताका स्वरूप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी ने नदियों पर पुल बँधवा दिए। बीच-बीच में ठहरने के लिए सुंदर घर बनवा दिए जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छाई है। बड़े जोर से बजते हुए नगाड़ों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात को आती हुई जानकर अगवानी करने वाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले। ’ मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥ ब्रह्माजी ने स्वोयं मंगलों का मूल लग्न का दिन देखा। हेमंत ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं। गायों के खुर से धूल उडे ऐसी बेला शादी के मुर्हुत के लिए तय की गई। निर्मल और सभी सुंदर मंगलों की मूल गोधूलि की पवित्र बेला आ गई। सुंदर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं। ’ सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥ सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥ शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द टोलियाँ बना-बनाकर विमानों पर जा चढ़े। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन सबको अपने.अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे हैं। शिव जी कहते है कि जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष मुट्ठी में आ जाते हैं ये वही जगत के माता-पिता श्री सीतारामजी हैं। नख से शिखा तक श्री रामचन्द्रजी के सुंदर रूप को बार.बार देखते हुए पार्वतीजी सहित श्री शिवजी का शरीर पुलकित हो गया है। ’ जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥ संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥ जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्री रामचन्द्रजी सवार हैं उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्री रामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे। श्री रामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुएए पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे। श्रेष्ठ देवांगनाएँ जो सुंदर मनुष्य स्त्रियों के वेश में हैं सभी स्वभाव से ही सुंदरी और श्यामा सोलह वर्ष की अवस्था वाली हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहिचान के ही वे सबको प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं। ’ चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥ ’ सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ कुल गुरू वशिष्ठन जी और जनक के कुल गुरू शादी करवा रहें है। श्री रामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जा रही है। दशरथजी मन में बहुत आनंदित हो रहे है। उसी समय, वशिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुश ध्वज की बड़ी कन्या माण्डवीजी को भरतजी को ब्याह दिया। जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुंदरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुंदर नेत्रों वाली, सुंदर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया। देवतागण फूल बरसा रहे हैंए राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनिए जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही हैए आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है। मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं। विवाह से बहुत पहले की बारात आ गई थी और मिथिला नरेश जनक जी और उनके परिवार के विशेष आग्रह पर बारात विव‍ाह के बाद भी काफी दिनों तक रूकी रही। राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं। प्रतिदिन सबेरे उठकर अयोध्या नरेश विदा माँगते हैं। पर जनकजी उन्हें प्रेम से रख लेते हैं। इस प्रकार बहुत दिन बीत गएए मानो बाराती स्नेह की रस्सी से बँध गए हैं। तब विश्वामित्रजी और शतानंदजी ने जाकर राजा जनक को समझाकर कहा कि अब दशरथजी को आज्ञा दीजिए। जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जाएगी तब वे व्याकुल होकर एक.दूसरे से बात पूछने लगे। जाना सत्य है यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गए मानो संध्या के समय कमल सकुचा गए हों। फिर, जानकी के विदाई का समय आ गया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गईं मानो थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों। वे बार-बार सीताजी को गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं। ’ सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥ अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥ आदर के साथ सब पुत्रियों को स्त्रियों के धर्म समझाकर रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्री जाति को क्यों रचा। जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल.पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था वे व्याकुल होकर कह रहे हैं। वैदेही कहाँ हैं, ऐसा पूछ रहे है। तब भाई सहित जनकजी वहाँ आए। मुरारी बापू कहते हैं कि जनक जी विवेकी हैं, विदेही है। उनपर ममता आशक्त नहीं होती लेकिन सीताजी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजा ने जानकीजी को हृदय से लगा लिया। प्रेम के प्रभाव से, ज्ञान की महान मर्यादा मिट गई ,ज्ञान का बाँध टूट गया। राजा ने सुंदर मुहूर्त जानकर सिद्धि सहित गणेशजी का स्मरण करके कन्याओं को पालकियों पर चढ़ाया। ’ सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥ भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥ सीताजी के चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो रहे हैं। मुरारी बापू कहते है कि बे‍ब्‍ी को सबसे ज्यावदा चिंता पिता की होती है। विदाई बेला में मां जानकी अपने माता-पिता को ढांडस बंधा रही है कि आपलोग परेशान मत होइएगा। हमारे साथ मेरी तीन बहनें भी हैं। हमलोग रघुकुल जा रहे है। ऐसा कहत कर मां जानकी रोने लगती है। फिर, अपनी मां सुनयना से कहती है कि माता आप पिताजी को विशेष ख्यारल रख्एिगा। इसके बाद बारात वधुएं सहित अयौघ्या नगरी पहुंची। अवध में नित्य ही मंगल, आनंद और उत्सव हो रहे हैं। इस तरह आनंद में दिन बीतते जाते हैं। दिनोंदिन राजा का सौ गुना भाव प्रेम देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं। अंत में जब विश्वामित्रजी ने विदा माँगी तब राजा प्रेममग्न हो गए और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गए। वे बोले., हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूं। हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहिएगा और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़ते है। और, मुनि तो मुनि होते है। मुरारी बापू कहते है कि जिस प्रकार से राम -लक्ष्महण को लेने के लिए विश्वामित्रजी आए थे उसी प्रकार लौट गए। मुनियें को धन-संपदा की क्यात जरूरत। जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आएए तब से सब प्रकार का आनंद अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में आनंद.उत्साह हुआए उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि तुलसी दास कहते है कि श्री रघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है,जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे वे लोग श्री जानकीजी और श्री रामजी की कृपा से सदा सुख पावेंगे।

वैश्विक प्रतिकूलता में आर्थिक सुधार की है सख्त जरूरत

नई दिल्ली्, कविलाश मिश्र 29 फरवरी को पेश होने वाला वर्ष 2016-17 के केंद्रीय बजट कैसा होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन समय-समय पर वित्त‍मंत्री अरूण जेटली की तरफ से देश की आर्थिक स्थिति को लेकर जो तस्वीयर पेश की जाती रही है उसमें वर्ष 2016-17 के बजट अनुमानों को तो ढूंढा ही जा सकता है। हालांकि, इस बार वित्तस मंत्रालय की तरफ से बजट को लेकर समाज के सभी वर्गों से सुझाव मांगे गए हैं। जाहिर हैं कि वित्ता मंत्रालय माइक्रो लेवल ( सुक्ष्मे स्त र) पर जाकर बजट बनाने से पूर्व देश की वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, संगठनात्मुक, व्यातपारात्मएक, व्यावसायिक, कारोबारिक, रोजगाररात्मजक सहित अन्य् कई पहलुओं की बारिकी से जांच करेगा। इसके बाद ही वर्ष 2016-17 की बजट की रूप रेखा तैयार हो पाएगी। इसी कार्य में पूरा वित्तीशय अमला जुटा हुआ है। लेकिन, इन सबके बीच विश्व की आर्थिक स्थिति को देखते हुए विश्व परिदृष्य को भी ध्या2न में रखना आवश्य क होगा। विश्वि की आर्थिक अर्थव्य्वस्थार का प्रभाव से भारत भी बच नहीं सकता है। 21वीं शताब्दी6 के शुरू के 16 वर्ष के दौरान ही विश्वै दूसरी आर्थिक मंदी की कगार पर खडा नजर आ रहा है। अर्थशास्त्री इस मंदी को भी वर्ष 2008 जैसा ही मान रहे हैं। 2008 के मंदी ने पूरे विश्वा को अपनी चपेट में लिया था। तब से यह कमोबेश जारी ही है। कभी रोम संकट सामने आता है तो कभी पूरा यूरोप, तो कभी यूरो संकट विश्वी अर्थव्य वस्था को प्रभावित करता दिखता रहा है। फ्रांस ने वित्तीभय अपातकाल की घोषणा कर डाली है। सामरिक और आर्थिक दृष्टि से विश्व की अगुवाई करने वाला देश अमेरिका की स्थिति कोई सही नहीं है। इस पर से तुर्रा यह कि चीन की अर्थव्य वस्थाि भी चरमराती नजर आ रही है। पिछले छह माह में चीन को अपनी मुद्रा का अवमुल्यरन कई बार करना पडा है। इस बात से भ्‍ाी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भविष्यो में और भी अवमुलयन हो सकते है। वित्तामंत्री श्री अरूण जेटली भी कह चुके है कि इस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है और इसका प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। उन्होंने विश्व बैंक द्वारा वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाकर 2.9 फीसदी किए जाने का जिक्र किया। उन्हों ने इस बात का जिक्र किया कि विश्वस की परस्पर जुड़ी हुई अर्थव्यवस्था में ऐसी अनेक चुनौतियों का प्रभाव एक-दूसरे पर भी पड़ता है। इसके कारण चीन में जो हो रहा है और तेल मूल्य में जो हो रहा है, उसका प्रभाव हमारे बाजार पर भी पड़ता है। जब मूल्यों में कमी आती है तो इससे हमारी आय भी प्रभावित होती है। शायद यह वैश्विबक स्थिति का परिणाम है कि वित्त वर्ष के लिए सरकार ने आर्थिक विकास का लक्ष्य 8.1 से 8;5 प्रतिशत से घटाकर सात से 7.5 प्रतिशत के बीच कर दिया है। हां, एक बार सरकार के पक्ष में है कि वैश्वियक स्थिति पर क्रुड ऑयल की दरों में कमी आने से भारत को लाभ मिला है। भारत , अपने कुल खपत का 80 फीसदी तेल विदेश से मंगाता है। भाजपा नीत राजग सरकार अपने कार्यकाल के दूसरे पूर्ण बजट की तैयारियों में जुटी है। अगर 2014 के अंतरिम बजट को गिना जाए तो यह तीसरा बजट होगा। बजट में आर्थिक वृद्धि को गति देने के उपायों पर विशेष जोर दिया जा सकता है। वित्त मंत्री श्री जेटली की चिंता ग्रामीण आय एवं मांग को पुनर्जीवित करनाे को लेकर भी है। वे दावोस में इस बात का उल्ले ख कर चुके है। ऐसे में लगता है, आगामी बजट में इस पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यदि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी से होने वाले नुकसान को कम करना चाहता है तो ग्रामीण मांग को बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है। इस सबके बीच वित्तमंत्री अर्थव्यतवस्थाण को लेकर सरकार का इरादा स्पदष्टज कर चुके है। वे पहले ही यह संकेत दे चुके है कि सरकार एकनिष्ठ होकर आर्थिक सुधार जारी रखेगी। श्री जेटली ने स्पाष्टक कहा कि सरकार सुधार जारी रखेगी। हम दिशा से भटक नहीं सकते और आज की परिस्थिति में हर राज्य को सहयोग करना होगा। पिछले दिनों वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सम्मेलन में सरकार की मंशा को उजागर किया था। उन्होंरने कहा था कि बजट उच्च विकास दर हासिल करने के लिए आर्थिक सुधारों पर केन्द्रित रहेगा। जेटली की बजट टीम में मुख्यरूप से सिन्हा के अलावा मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम् और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढिय़ा हैं। इसके अलावा वित्त सचिव रतन वाटल, राजस्व सचिव हँसमुख अधिया और आर्थिक मामले विभाग के सचिव शक्तिकांता दास शामिल हैं। बजट तैयारियों के सिलिसले में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन राजन कह चुके है कि वित्तीय मजबूती के ढर्रे पर कड़ाई से अड़े रहने की जरूरत है। साथ ही, उन्होंरने सलाह दी है कि व्यय की जाने वाली राशि के बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जाए। नवंबर महीने के औद्योगिक उत्पादन का ताजा आंकड़े में 3.2 फीसदी की गिरावट आई है। यह आंकड़ा सुस्ती की ओर इशारा कर रहा है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि वर्ष 2016-17 का केंद्रीय बजट को लेकर संभावित वैश्विक स्थिति को भ्‍ीा ध्याोन में रखना होगा। चीन की अर्थ व्य2वस्थास को भी ध्याान में रखकर भारत को अपनी नीति बनानी पर सकती है। आज के समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं है। चीन की मुद्रा के क्रमिक अवमूल्यन, हमारी प्रतिस्पर्द्धा के आगे घटने और अमेरिकी ब्याज दर में क्रमिक बढ़ोतरी से वैश्विक पूंजी के पुनः अमेरिका की तरफ खिसकने के प्रति भारत को विशेष रूप से जागरूक रहना होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्तू दोहरी मार झेल रही है। उत्पादकों के लिए मूल्य घट रहे हैं तो उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र को लिया जा सकता है। यहां ज्यादातर खाद्यान्न वस्तुओं के उपभोक्ता मूल्यों में बढ़ोतरी दिखाई देती है लेकिन व्ययवसायी और किसानों की आय घटती जा रही है। जबकि आम आदमी खाद्य वस्तुओं में महंगाई की मार झेल रहा है। रिजर्व बैंक गर्वनर रघुराम राजन ने भी इस ओर संकेत कर चुके है कि वैश्विक रूप से वस्तुओं की कीमतों में अपस्फीति का असर भारत में उत्पादकों के लिए घटती कीमत के रूप में दिख रहा है। खादय पदार्थ की मंहगाई भी सरकार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। हालांकि, कुल मुद्रा र्स्फी ति दी में कमी आई है लेकिन खादय पदार्थों के मूल्य आम जन को परेशान कर रहा है। खाद्य एवं दैनिक इस्तेमाल वाले खाद्य जिंसों की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिये। आवश्यक जिंसों के सटोरिया वायदा कारोबार को प्रतिबंधित करने के साथ जमाखोरी को रोकना चाहिये तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण एवं सार्वभौमिकरण किया जाना चाहिये। इस बात की भी संभावना है कि अर्थव्यवस्था में निवेश का माहौल बनाने व घरेलू मांग बढ़ाने के साथ ही आगामी बजट का फोकस गरीबों और नौजवानों पर होगा। इसके लिए स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया और ग्रामीण आवास जैसे कार्यक्रमों के बजट में खासी वृद्धि हो सकती है। कुल योजनागत आवंटन में 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी की जा सकती है। एक तरफ सरकार की रणनीति मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों को ध्यान में रखते हुए निवेश को प्रोत्साहित करने की है। साथ ही, केंद्र के पास उपलब्धम वित्तीय संसाधनों को न्यायसंगत तरीके से गांव और शहर के गरीबों के लिए आवंटित करना है। पिछली बार की तरह इस बार भी इस बात की संभावना है कि इस बजट में भी जेटली डायरेक्ट टैक्सों के सुधार पर ध्यान देंगे। इसका फायदा सभी को होगा। इनकम टैक्स की दरों में कमी आने की इससे पूरी संभावना है। इसके अतिरिक्त देश में राजमार्गों का जाल बिछाया जाने को लेकर भी जेटली इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं के लिए भारी राशि का ऐलान करेंगे। भारत सरकार खाली पड़ी सरकारी जमीन को लीज पर दे सकती है। हर, बार कि तरह इस बार भी तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ने की संभावना है। पीएसयू बैंकों की स्थिति को देखते हुए संभावना है कि सरकार बैंकों के शेयर बेचने की भी घोषणा कर दें। सब्सिडी, जरूरत मंद को ही मिले इसे लेकर भी सरकार घोषणा कर सकती है। सरकार के लिए असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ सुनिश्चित कराना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। पिछले दिनों वित्त मंत्री भी इस बात को कह चुके है। संभव है कि इस बार के बजट के दौरान इस क्षेत्र के लिए विशेष रूप से कोई बडी घोषण हो सके। एक कार्यक्रम में श्री जेटली कह चुके है कि निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों, पलायन करके आए श्रमिकों व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता जैसी विभिन्न योजनाओं के स्वयंसेवकों को स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा लाभ सुनिश्चित करना मौजूदा सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। उद्योग संघ एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने सरकार से आग्रह किया कि दीर्घावधि बचत पर कटौती की सीमा (कर मुक्त बचत की सीमा) वर्तमान 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये की जाए। इससे मांग बढ़ेगी और उससे आर्थिक विकास की गति बढ़ेगी। एसोचैम ने आवासीय ऋण के ब्याज पर कटौती वर्तमान दो लाख रुपये से बढ़ाकर तीन लाख रुपये करने और मूल धन के चुकता पर भी कटौती की सीमा वर्तमान एक लाख रुपये से बढ़ाकर तीन लाख रुपये करने का वित्तू मंत्रालय से अनुरोध किया गया है। वेतनभोगियों को लाभ पहुंचाने के लिए संघ ने अवकाश नकदीकरण पर छूट (लीव एनकैशमेंट एक्जेंप्शन) की सीमा बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने के सुझाव दिए हैं। एसोचैम के सुनील कनोरिया ने कहा कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने तीन लाख रुपये की वर्तमान सीमा 1998 में लागू की थी और इसमें काफी वृद्धि करने की जरूरत है। एसोचैम ने मकान किराया और परिवहन भत्ता पर छूट की सीमा बढ़ाकर प्रति महीने तीन हजार रुपये की जानी चाहिए। एसोचैम ने पेशेवर की तरह वेतनभोगियों के लिए भी मूल्यह्रास भत्ता शुरू करने की सिफारिश की है। मंदी और आर्थिक सुस्ती से जूझ रहे देश के रियल एस्टेफट सेक्ट।र को सरकार की तरफ से आक्सीहजन की जरूरत है। रियल एस्टे्ट सेक्टजर ने आगामी बजट में सरकार से इसे इंडस्ट्री का दर्जा दिए जाने का आग्रह किया है। नेशनल रियल एस्टेसट डेवलपमेंट काउंसिल (नारेडको) ने होम लोन के ब्यााज भुगतान पर मिलने वाली दो लाख रुपए की सीमा को बढ़ाकर तीन लाख किए जाने की भी मांग की है। बड़ी नामी कंपनियां इस क्षेत्र में आएंगी और कॉरपोरेट संस्कृति तथा अनुशासन आएगा। इसका लाभ अर्थव्यवस्था के साथ-साथ ग्राहकों को मिलेगा। एक अनुमान के अनुसार देश में 1.88 करोड़ मकानों की कमी है। हालांकि, सरकार ने 2022 तक देश में दो करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पाना तभी संभव होगा जब मकान बनाने के लिए जमीन और बैंकों से आसान ऋण उपलब्ध होगा। कृषि क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भी वित्त मंत्री से मुलाकात कर किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर 5 लाख रुपए तक कर्ज उपलब्ध् कराने की मांग की है। साथ ही एमएसपी बढ़ाने, फसल बीमा कवरेज बढ़ाने और स्थायी निर्यात नीति बनाने की भी मांग की। फिलहाल किसान सात फीसदी ब्याज पर 3 लाख रुपए तक का ही कर्ज दिया जा रहा है। लोन समय पर चुकाने पर उन्हें ब्याज में तीन फीसदी की छूट मिलती है। किसान संगठन भारत कृषक समाज (बीकेएस) के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने सकरार से कहा है कि एक फीसदी ब्याज दर पर सरकार को दो लाख रुपए तक कर्ज पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ाकर दोगुनी करनी चाहिए। फर्टिलाइजर उद्योग की संस्था एफएआई ने बैठक के दौरान कहा कि किसानों को सीधे यूरिया सब्सिडी ट्रांसफर करने की सुविधा शुरू होनी चाहिए। 50000 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया के भुगतान के लिए अगले तीन साल तक बजट में अधिक राशि का आवंटन होना चाहिए। इसके अतिरिक्तक, ट्रेड यूनियनों की तरफ से सरकार से कहा गया है कि व्यक्तिगत आयकर छूट सीमा पांच लाख रुपए किया जाए। साथ ही, न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 18000 रुपए किया जाए। न्यूनतम मासिक पेंशन 3000 रुपए करने की मांग भी वित्तकमंत्री से की गई है। सचदेवा ने बीमार सार्वजनिक उपक्रमों के पुनरद्धार के लिये बजट समर्थन दिये जाने की भी मांग की है। उन्होंने आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिये प्रभावी कदम उठाने की भी मांग की है।

Monday, April 11, 2016

संयुक्त प्रयासों से ही होगी स्वच्छता- विरेन्द्र बब्बर

नई दिल्ली,11 अप्रैल,आकाश द्विवेदी।उत्तरी दिल्ली नगर निगम के स्थायी समिति के उपाध्यक्ष व वार्ड क्रमांक 89 पहाड़गंज क्षेत्र से पार्षद विरेन्द्र बब्बर ने बताया कि उनके क्षेत्र में 400 कूड़ेदान लगाए जाएंगे। जिसकी शुरूआत आज क्षेत्र के सबसे अधिक भीड़भाड़ वाले स्थान दिल्ली रेलवे स्टेशन पर किया गया।
उन्होंने बताया कि 400 कूड़ेदानों में से 50 कूड़ेदान लगाए जाने का कार्य पूर्ण हो चुका है व अन्य कूड़ेदानों को उचित स्थानों में जल्द से जल्द लगाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इन कूड़ेदानों को मार्केट एसोसिएशन व रेसिडेंशियल वेलफेयर एसोसिएशन के सहयोग से लगाया जा रहा है, इन कूड़ेदानों को लगाने में निगम का किसी भी तरह का वित्तीय व्यय नहीं हो रहा है। बब्बर ने कहा कि पूरे क्षेत्र में स्वच्छता, संयुक्त प्रयास से ही सुनिश्चित की जा सकती है,। उन्होंने कहा कि कूड़ेदानों के उपयोग के लिए स्थानीय नागरिकों को सकारात्मक प्रयास करने होगें ताकि क्षेत्र की स्वच्छता सुनिश्चित की जा सके।